समाज, समय और संविधान

जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़ उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हैं और अपने फैसलों व विचारों के लिए जाने जाते हैं। अपने पिता जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ की 101वीं जन्म वार्षिकी के अवसर पर आनलाइन वेबिनार में बोलते हुए उन्होंने समाज व संविधान के संदर्भ में विद्यार्थियों की भूमिका को लेकर कई अहम मुद्दे उठाए।

आगे पढ़े

कोविड सपोर्ट ग्रुप – सहयोग का अनूठा प्रयोग

यूँ तो सहयोग में अद्भुत ताकत है, पर भारत के अन्य राज्यों के विपरीत उत्तराखंड में गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग के मामले थोड़ा कम ही सुनने में आते हैं। ऐसे में कोविड सपोर्ट ग्रुप का प्रयोग एक नई संभावना की ओर इशारा करता है।

आगे पढ़े

कोरोना काल में उत्तराखंड के पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था

कोरोना के संदर्भ में देखें तो उत्तराखंड के पहाड़ों की स्तिथि डरावनी लगती है। कहीं कोई तैयारी नहीं दिखती। आंकड़ों की माने तो पहाड़ के समस्त जिलों का मिला जुला औसत राज्य के मूल औसत से कम है, जो अपने आप में कम है। ऊपर से पहाड़ी इलाकों में सुविधाएँ अमूमन जिला मुख्यालयों तक ही सीमित है। लोगों को इस बात का रंज हो या न हो, पर पहाड़ों को जरूर इस बात का दुख रहेगा की उसके दोहन शोषण के लिए हम चार लेन सड़क तो ले आए पर हम यहाँ के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ न दे सके।

आगे पढ़े

उत्तराखंड की वनाग्नि और अदालती आदेश

हर तरफ धुआँ ही धुआँ है। जंलते जंगलों का धुआँ। ऐसे में अदालती आदेश उन बादलों से लगते हैं जो अपनी बारिश से वनाग्नि बुझाने की क्षमता तो रखते ही हैं, धुएँ की पर्त को हटा कर हमें दूरदृष्टि भी प्रदान कर सकते हैं। ये अलग बात है की अवमानना की हवा अक्सर इन बादलों को नाकाम कर देती है।

आगे पढ़े

हरित क्रांति के नाम एक खुला पत्र

हरित क्रांति का जनक श्री एम एस स्वामीनाथन को लिखा यह पत्र खेती को लेकर भास्कर सावे जी के विचारों का अच्छा प्रस्तुतीकरण है। पत्र में भास्कर जी लिखते हैं – मैं आशा करता हूँ यह पत्र इस गंभीर विषय पर आत्मविश्लेषण और खुले विचार विमर्श को प्रोत्साहित करेगा ताकि हम उन भारी भूलों को ना दोहराएँ जिनके कारण आज हम अव्यवस्था के दलदल में फँस से गए हैं।

आगे पढ़े

हम गैरसैंणी हैं!

वर्तमान में अल्मोड़ा जिले का निवासी होने के कारण इस बात का दुख होना चाहिए की ऐतिहासिक कुमाऊँ की राजधानी ही कुमाऊँ का हिस्सा नहीं बची पर वह दुख भी नहीं होता। सोचता हूँ की क्या बदल जाएगा गैरसैंण का हिस्सा हो जाने से?

आगे पढ़े

ब्राह्मणवाद के नाम एक पत्र

कुछ समय पहले की बात है कि मेरी जान पहचान के एक ‘ब्राह्मण’ ने अचानक बड़ी अजीब सी बात कर दी। वो बोले, चाहे कुछ भी हो जाए मैं किसी दलित या आदिवासी को अपने रसोई में घुसने नहीं दे सकता। उनकी यह बात सुन कर एक झटका सा लगा। समझ नहीं आया की लोग इतना कुछ जानते हुए भी इतने अनजान क्यों हैं?

आगे पढ़े

व्यावसायिक कुमाऊँनी गीत और स्त्री

शादी समारोह में बजने वाले कुमाउनी गीतों को सुनकर दिव्या पाठक को महसूस होता था कि पितृसत्ता की जड़ें कितनी मजबूती से अपनी पकड़ बनाये हुए हैं। उनका मानना है कि ऐसे गीतों की बढ़ती लोकप्रियता हमारे समाज की मानसिकता और स्त्रियों के प्रति उनके रवैये को भी साफ तौर पर पेश करती है। एक बातचीत।

आगे पढ़े

कौन देता है थल के बाजार को यूँ सीटी बजाने का हक?

आप ये लेख पढ़ें इससे पहले आपको आगाह करना चाहता हूँ की यह लेख ‘थल की बजारा’ के गीतकार व गायक पर किसी तरह का निजी प्रहार नहीं हैं। यह एक सवाल है हमारी सामंती व्यवस्था और सोच पर जिसे उत्तेजना नहीं अपितु समग्रता से देखने की जरूरत है।

आगे पढ़े

ननगेली ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा!

शोषण और दमन का विरोध करने वालों की सूची बहुत लम्बी है। कैसी- कैसी परिस्थिति में लोग शोषण और दमन के खिलाफ क्या क्या कर गुज़रे ये सुन कर ही दिल दहल जाता है। ननगेली की कहानी अगर आप सुन लें तो शायद मनुष्य होने पर भी शर्म आने लगे।

आगे पढ़े