कैसे पहाड़? किसका उत्तराखण्ड?

फिर एक चुनाव प्रक्रिया पूर्ण हुई। नई सरकार बनी। कुछ दिनों तक चुनावी राजनीति पर चर्चा बनी रहेगी और फिर पाँच साल का सन्नाटा,और जब हम जागेंगे तब तक उत्तराखंड एक मैदानी राज्य बन चुका होगा! क्योंकि उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य ही नहीं बचेगा इसलिए पहाड़ बहस का मुद्दा भी नहीं रहेंगे। इस जटिल स्थिति से निजाद पाने के हमारे पास तीन तरीके हैं।

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शिक्षा का अधिकार अधिनियम के नीतिगत अंधेपन को भोगते गरीब बच्चे

नीति निर्माण के काम को बहुत संयम व दूरदर्शिता की जरूरत होती है। उनके बगैर बनी नीतियाँ अपने शुरुवाती दौर में ही पस्त हो जाती हैं। शिक्षा का अधिकार (आर.टी.ई.) अधिनियम के तहत अपवंचित व कमजोर वर्ग के बच्चों लिए सभी विद्यालयों में, यहाँ तक की निजी विद्यालयों में भी, मुफ़्त शिक्षा का प्रायोजन इसका एक जीवन्त उदाहरण है।

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शौका और राजस्थानी भाषा का अंतर्संबंध

उत्तराखंड की उत्तरी सीमा से लगी घाटियों के लोगों की संस्कृति के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। भारत तिब्बत व्यापार खत्म होने के पश्चात इन घाटियाँ की संस्कृति ही नहीं बोली/भाषा भी लुप्त होने की कगार पर हैं। सभी घाटियों के निवासी अपनी संस्कृति को बचाने के विभिन्न प्रयास कर रहे हैं। जोहार घाटी की शौका बोली को संरक्षित करने के सिलसिले में श्री गजेन्द्र सिंह पाँगती से एक बातचीत।

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गोरीपार का धर्मेन्द्र

कुछ दिन पहले एक युवा कलाकार से मुलाकात हुई – धर्मेन्द्र जेष्ठा। फिर यूट्यूब पर धर्मेन्द्र का काम देखा। अपने कैमरे के माध्यम से मुझे वह उन जगहों पर ले गया जिसके बारे हम अक्सर सोचते रह जाते हैं – वहाँ, उस पहाड़ी के पीछे का दृश्य कैसा होगा ?

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समाज, समय और संविधान

जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़ उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हैं और अपने फैसलों व विचारों के लिए जाने जाते हैं। अपने पिता जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ की 101वीं जन्म वार्षिकी के अवसर पर आनलाइन वेबिनार में बोलते हुए उन्होंने समाज व संविधान के संदर्भ में विद्यार्थियों की भूमिका को लेकर कई अहम मुद्दे उठाए।

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कोविड सपोर्ट ग्रुप – सहयोग का अनूठा प्रयोग

यूँ तो सहयोग में अद्भुत ताकत है, पर भारत के अन्य राज्यों के विपरीत उत्तराखंड में गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग के मामले थोड़ा कम ही सुनने में आते हैं। ऐसे में कोविड सपोर्ट ग्रुप का प्रयोग एक नई संभावना की ओर इशारा करता है।

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कोरोना काल में उत्तराखंड के पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था

कोरोना के संदर्भ में देखें तो उत्तराखंड के पहाड़ों की स्तिथि डरावनी लगती है। कहीं कोई तैयारी नहीं दिखती। आंकड़ों की माने तो पहाड़ के समस्त जिलों का मिला जुला औसत राज्य के मूल औसत से कम है, जो अपने आप में कम है। ऊपर से पहाड़ी इलाकों में सुविधाएँ अमूमन जिला मुख्यालयों तक ही सीमित है। लोगों को इस बात का रंज हो या न हो, पर पहाड़ों को जरूर इस बात का दुख रहेगा की उसके दोहन शोषण के लिए हम चार लेन सड़क तो ले आए पर हम यहाँ के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ न दे सके।

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उत्तराखंड की वनाग्नि और अदालती आदेश

हर तरफ धुआँ ही धुआँ है। जंलते जंगलों का धुआँ। ऐसे में अदालती आदेश उन बादलों से लगते हैं जो अपनी बारिश से वनाग्नि बुझाने की क्षमता तो रखते ही हैं, धुएँ की पर्त को हटा कर हमें दूरदृष्टि भी प्रदान कर सकते हैं। ये अलग बात है की अवमानना की हवा अक्सर इन बादलों को नाकाम कर देती है।

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हरित क्रांति के नाम एक खुला पत्र

हरित क्रांति का जनक श्री एम एस स्वामीनाथन को लिखा यह पत्र खेती को लेकर भास्कर सावे जी के विचारों का अच्छा प्रस्तुतीकरण है। पत्र में भास्कर जी लिखते हैं – मैं आशा करता हूँ यह पत्र इस गंभीर विषय पर आत्मविश्लेषण और खुले विचार विमर्श को प्रोत्साहित करेगा ताकि हम उन भारी भूलों को ना दोहराएँ जिनके कारण आज हम अव्यवस्था के दलदल में फँस से गए हैं।

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हम गैरसैंणी हैं!

वर्तमान में अल्मोड़ा जिले का निवासी होने के कारण इस बात का दुख होना चाहिए की ऐतिहासिक कुमाऊँ की राजधानी ही कुमाऊँ का हिस्सा नहीं बची पर वह दुख भी नहीं होता। सोचता हूँ की क्या बदल जाएगा गैरसैंण का हिस्सा हो जाने से?

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