शिक्षा का अधिकार अधिनियम के नीतिगत अंधेपन को भोगते गरीब बच्चे

नीति निर्माण के काम को बहुत संयम व दूरदर्शिता की जरूरत होती है। उनके बगैर बनी नीतियाँ अपने शुरुवाती दौर में ही पस्त हो जाती हैं। शिक्षा का अधिकार (आर.टी.ई.) अधिनियम के तहत अपवंचित व कमजोर वर्ग के बच्चों लिए सभी विद्यालयों में, यहाँ तक की निजी विद्यालयों में भी, मुफ़्त शिक्षा का प्रायोजन इसका एक जीवन्त उदाहरण है।

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कोविड सपोर्ट ग्रुप – सहयोग का अनूठा प्रयोग

यूँ तो सहयोग में अद्भुत ताकत है, पर भारत के अन्य राज्यों के विपरीत उत्तराखंड में गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग के मामले थोड़ा कम ही सुनने में आते हैं। ऐसे में कोविड सपोर्ट ग्रुप का प्रयोग एक नई संभावना की ओर इशारा करता है।

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दिल्ली और पर्यटन से आगे

सूचना क्रांति और युवाशक्ति के इस दौर में आजीविका के काम करने में कोई खास परेशानी नहीं होनी चाहिए, बशर्ते कि विकास की योजनाएँ मैदान की जगह पहाड़ केंद्रित हों। इस तरह की योजनाएँ सिर्फ एक एनआरएलएम और कुछ बाहरी फंडिंग की जिम्मेदारी मान के पल्ला झाड़ लेने से क्रियान्वित नहीं हो पायेंगी। रोजगार सृजन को एकल लेंस से देखने के बजाय समेकित नजर देने की जरूरत है।

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कोविड, हम और हमारे गाँव

कोविड ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत और नीति-नियन्ता के रूप में हमारी क्षमता को बुरी तरह से बेपर्दा कर सामने ला दिया है। यदि अब भी हमनें समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो गाँवों में उभरते हालात किस तरह की चुनौतियाँ पैदा करेंगे इसका शायद हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।

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कोरोना काल में उत्तराखंड के पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था

कोरोना के संदर्भ में देखें तो उत्तराखंड के पहाड़ों की स्तिथि डरावनी लगती है। कहीं कोई तैयारी नहीं दिखती। आंकड़ों की माने तो पहाड़ के समस्त जिलों का मिला जुला औसत राज्य के मूल औसत से कम है, जो अपने आप में कम है। ऊपर से पहाड़ी इलाकों में सुविधाएँ अमूमन जिला मुख्यालयों तक ही सीमित है। लोगों को इस बात का रंज हो या न हो, पर पहाड़ों को जरूर इस बात का दुख रहेगा की उसके दोहन शोषण के लिए हम चार लेन सड़क तो ले आए पर हम यहाँ के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ न दे सके।

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‘भुला दी गई महामारियों’ से हमने कुछ नहीं सीखा

आज एक बार फिर कोरोना के रूप आई महामारी की भयावहता ने सिद्ध कर दिया है कि हम अंधविश्वास और पोंगापंथी के चलते इस विभीषिका के सामने लाचार होते चले जा रहे हैं। अपने अतीत से हमने कुछ सबक नहीं सीखा। शायद यह हमारी सामूहिक चेतना और वैज्ञानिक समझ का प्रतिफल ही रहा कि महामारियाँ भुला दी गईं और हम इनकी गंभीरता को नहीं समझ सके।

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उत्तराखंड की वनाग्नि और अदालती आदेश

हर तरफ धुआँ ही धुआँ है। जंलते जंगलों का धुआँ। ऐसे में अदालती आदेश उन बादलों से लगते हैं जो अपनी बारिश से वनाग्नि बुझाने की क्षमता तो रखते ही हैं, धुएँ की पर्त को हटा कर हमें दूरदृष्टि भी प्रदान कर सकते हैं। ये अलग बात है की अवमानना की हवा अक्सर इन बादलों को नाकाम कर देती है।

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उत्तराखंड के सपने और यथार्थ

9 नवंबर 2000 को पृथक राज्य के रूप में उत्तराखंड अस्थित्व में आया। ऐसा लगता है की पिछले दो दशकों में विकास की गति के साथ-साथ सामाजिक चेतना की लौ भी धीमी पड़ गई है। बोये गए सपने जिस तरह बिखरते चले गए हैं उसने न केवल सामाजिक उत्साहहीनता की स्थिति ला खड़ी की है बल्कि लागू किये जा रहे आधुनिक विकास माडल पर भी सवालिया निशान लगा दिये है।

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वो तीन पहल जो बदल सकती हैं उत्तराखंड का भविष्य

आज उत्तराखंड स्थापना के बीस बर्ष पूरे हुए। इस अवसर पर ज्ञानीमा द्वारा आयोजित ‘उत्तराखंड विचार प्रतियोगिता’ के तहत जिस लेख को चयनित किया गया है उसके लेखक हैं पुणे के श्री जीवन सिंह खाती।

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उत्तराखंड के पहाड़ों में मशरूम – इतिहास और भविष्य

सत्तर के दशक से ही पहाड़ों में मशरूम उत्पादन द्वारा रोजगार के वैकल्पिक तरीकों को बढ़ाने की कोशिश होती रही है। पर मशरूम की खेती परंपरागत खेती से पूरी तरह भिन्न है। इसमें तकनीक की प्रधानता है इसलिए उत्पादकों को ठीक से तकनीक को समझना और अपनाना आवश्यक है।

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