गोरीपार का धर्मेन्द्र

कुछ दिन पहले एक युवा कलाकार से मुलाकात हुई – धर्मेन्द्र जेष्ठा। फिर यूट्यूब पर धर्मेन्द्र का काम देखा। अपने कैमरे के माध्यम से मुझे वह उन जगहों पर ले गया जिसके बारे हम अक्सर सोचते रह जाते हैं – वहाँ, उस पहाड़ी के पीछे का दृश्य कैसा होगा ?

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एक शहर का बनना और बिखरना

नैनीताल शहर से मेरा वर्षों का नहीं बल्कि सदियों का नाता रहा है। मेरे पुरखे और मैं इस शहर को बनते और बिखरते देखते आये हैं। कभी कभी तो लगता है की मेरा नैनीताल इतना बिखर गया है कि यह अपना सा नहीं लगता।

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समाज, समय और संविधान

जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़ उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हैं और अपने फैसलों व विचारों के लिए जाने जाते हैं। अपने पिता जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ की 101वीं जन्म वार्षिकी के अवसर पर आनलाइन वेबिनार में बोलते हुए उन्होंने समाज व संविधान के संदर्भ में विद्यार्थियों की भूमिका को लेकर कई अहम मुद्दे उठाए।

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कोविड, हम और हमारे गाँव

कोविड ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत और नीति-नियन्ता के रूप में हमारी क्षमता को बुरी तरह से बेपर्दा कर सामने ला दिया है। यदि अब भी हमनें समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए तो गाँवों में उभरते हालात किस तरह की चुनौतियाँ पैदा करेंगे इसका शायद हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।

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‘भुला दी गई महामारियों’ से हमने कुछ नहीं सीखा

आज एक बार फिर कोरोना के रूप आई महामारी की भयावहता ने सिद्ध कर दिया है कि हम अंधविश्वास और पोंगापंथी के चलते इस विभीषिका के सामने लाचार होते चले जा रहे हैं। अपने अतीत से हमने कुछ सबक नहीं सीखा। शायद यह हमारी सामूहिक चेतना और वैज्ञानिक समझ का प्रतिफल ही रहा कि महामारियाँ भुला दी गईं और हम इनकी गंभीरता को नहीं समझ सके।

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उत्तराखंड की फागुनी बहारें

भारत में लोक उत्सव गतिशीलता और विविधता के अनूठे उदाहरण हैं। लोक उत्सवों की इस विविधता का एक रूप उत्तराखंड की होली है। यहाँ यह बसंत ऋतु का सबसे महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। लम्बे ठिठुरन भरे महीनों के बाद फागुन के आते ही जैसे-जैसे पहाड़ों में तापमान बढ़ना शुरू होता है, प्रकृति भी अपना रूप बदलने लगती हैं।

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ब्राह्मणवाद के नाम एक पत्र

कुछ समय पहले की बात है कि मेरी जान पहचान के एक ‘ब्राह्मण’ ने अचानक बड़ी अजीब सी बात कर दी। वो बोले, चाहे कुछ भी हो जाए मैं किसी दलित या आदिवासी को अपने रसोई में घुसने नहीं दे सकता। उनकी यह बात सुन कर एक झटका सा लगा। समझ नहीं आया की लोग इतना कुछ जानते हुए भी इतने अनजान क्यों हैं?

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कुली बेगार आंदोलन के सौ वर्ष

आज से ठीक सौ साल पहले, दस हजार से ज्यादा काश्तकार-किसान बागेश्वर के उत्तरायणी कौतीक में इकठ्ठा होकर ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध कर रहे थे। देखते ही देखते सभा में उपस्थित ग्राम प्रधानों समेत कई मालगुजारों ने बेगार से जुड़े कुली रजिस्टर सरयू नदी में बहा डाले। यह घटना अंग्रेज सरकार द्वारा अपने नागरिकों के खिलाफ अपनाई जा रही शोषक और अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध उत्तराखंड के किसानों के व्यापक प्रतिरोध की पहली संगठित अभिव्यक्ति थी।

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व्यावसायिक कुमाऊँनी गीत और स्त्री

शादी समारोह में बजने वाले कुमाउनी गीतों को सुनकर दिव्या पाठक को महसूस होता था कि पितृसत्ता की जड़ें कितनी मजबूती से अपनी पकड़ बनाये हुए हैं। उनका मानना है कि ऐसे गीतों की बढ़ती लोकप्रियता हमारे समाज की मानसिकता और स्त्रियों के प्रति उनके रवैये को भी साफ तौर पर पेश करती है। एक बातचीत।

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कौन देता है थल के बाजार को यूँ सीटी बजाने का हक?

आप ये लेख पढ़ें इससे पहले आपको आगाह करना चाहता हूँ की यह लेख ‘थल की बजारा’ के गीतकार व गायक पर किसी तरह का निजी प्रहार नहीं हैं। यह एक सवाल है हमारी सामंती व्यवस्था और सोच पर जिसे उत्तेजना नहीं अपितु समग्रता से देखने की जरूरत है।

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