चार धाम, चार लेन और चार सवाल!

चार धाम यात्रा उत्तराखंड पर्यटन का एक अभिन्न हिस्सा है। गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ दर्शन के लिए हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु उत्तराखंड आते हैं। समय के साथ-साथ जहाँ आगंतुकों की संख्या बढ़ी है, वहीं उनके दृष्टिकोण में भी बदलाव आया है। अब काफी आगंतुक श्रद्धालु कम पर्यटक ज्यादा होते हैं जो गर्मियों में ठंड का लुत्फ़ लेने के लिए यहाँ पधारते हैं।

इन सभी पर्यटकों के सफर को आसान बनाने की एक परियोजना है ‘चारधाम मार्ग का पुनरुद्धार’ जिसके तहत लगभग 900 किलोमीटर लम्बी सड़क का चौड़ीकरण होना है। इस विकास योजना की शुरुआती लागत है 12,000 करोड़ रुपये! परियोजना के तहत इस ‘सामरिक’ मार्ग को ‘ऑल वेदर’ यानि हम मौसम में खुले रहने वाला मार्ग बनाने के लिए इसका चौड़ीकरण किया जा रहा है। इस सड़क के अधिकांश भाग लगभग 10 मीटर चौड़े होंगे।

क्योंकि सड़क हवा में नहीं बनती, इस काम के लिए पहाड़ और पेड़ काटे जाने लाज़िमी हैं। गैरकानूनी रूप से पेड़ों का कटान रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई जिसके कारण कोर्ट ने एक ‘हाई पॉवर्ड कमेटी’ का गठन किया। 26 सदस्यों की इस कमेटी ने कोर्ट और सरकार को बताना था कि यह परियोजना पर्यावरण मानकों का उल्लंघन करती है या नहीं। जानकारों की माने तो शुरू में कमेटी इस परियोजना का विरोध करती दिखी लेकिन धीरे-धीरे कमेटी के अधिकांश सदस्यों ने अपने मत बदल दिए। आखिरकार कमेटी के अध्यक्ष और उनके तीन साथी ही विरोध में खड़े रहे, अपनी ही कमेटी में अल्पसंख्यक बन कर। इस कारण सरकार को दो रिपोर्टें जमा की गईं।

इधर बरसात में पहाड़ दरकते रहे और लोग मरते रहे। जहाँ कुछ लोग इन आपदाओं को दैवीय कहते हैं तो कई अन्य इन्हें विकास के नाम पर नरसंहार बताते हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि पर्यावरण के नाम पर खुद पर्यावरण कार्यकर्ता ही खेमों में बँटे हुए से प्रतीत हो रहे हैं – कुछ विरोध में हैं, कुछ सहयोग का राग अलाप रहे हैं तो कुछ एक कोने में चुप्पी लगाए बैठे हैं। कभी कभी लगता है की इन सबके मत अलग-अलग नहीं हैं। असल मसला चश्मों के रंग का है। कुछ रंग अकादमिक हैं तो कुछ शायद विवशताओं से जुड़े हैं! पर जरूरी नहीं कि विवशताएँ राजनैतिक ही हों। और भी गम हैं जमाने में राजनीति के सिवा!

कभी-कभी ये भी लगता है कि मतभेद का सबसे बड़ा कारण शायद विशेषज्ञों की ‘विशेष’ को ‘देखने’ और ‘समझने’ की विशेषज्ञता में है जिसके कारण अधिकांश विशेषज्ञों ने मसलों को सम्पूर्णता में देखना व समझना प्रायः बंद सा कर दिया गया है। इस प्रवृत्ति के पीछे भी अनेक कारण हैं पर उस पर चर्चा कभी बाद में। फिलहाल अंधों से भरे कमरे के उस हाथी की बात करते हैं जिसका किसी ने पाँव पकड़ रखा है तो किसी ने पूँछ। कोई दाँत सहला रहा है तो कोई आँखों की गोलाई आँक रहा है। इस सब के चलते अलग-अलग सवाल पूछे जा रहे हैं और उत्तर के स्थान पर सवालों के लिए लड़ाई हो रही हैं। और असल मसला विवाद के कमरे में समूचे हाथी की तरह जस का तस है।

सच पूछिए तो मसला केवल कट रहे पेड़ों और दरक रहे पहाड़ों का है ही नहीं। उस ‘गैरकानूनी’ को तो कभी भी ‘कानूनी’ बनाया जा सकता है। किसी भी सरकार के लिए यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। कोर्ट द्वारा निर्धारित कमेटी की रिपोर्ट से बड़ा और क्या प्रमाण चाहिए हमको? जिसे हम आज नाजायज कह रहे हैं, वह कल जब कानूनी रूप से जायज हो जाएगा तो हम क्या कर लेंगे? किस कोर्ट में जायेंगे?

ऐसा लगता है कि इस मुद्दे को लेकर शायद प्रश्न ही गलत हैं। तभी शायद विरोध कर रहे कमेटी सदस्य भी ‘थोड़े बहुत’ चौड़ीकरण के लिए तैयार हैं। और वो चाहते हैं कि चौड़ीकरण कितना हो, यह कोर्ट तय करे। अब इस बात का क्या निष्कर्ष निकाला जाए?

बहरहाल चौड़ीकरण को लेकर मन में कुछ मूलभूत प्रश्न बार-बार आते हैं जिन्हें आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि तार्किक संवाद हो और हम किसी वाजिब निष्कर्ष पर पहुँचें।

पहला प्रश्न
क्या यह सड़क ‘सामरिक महत्व’ के कारण बन रही है?

यह बात बार-बार कही जाती है कि इस सड़क का सामरिक महत्व है। अगर सड़क का सही में सामरिक महत्व है तो इसे जरूर बनाना चाहिए। पर वह सामरिक महत्व है क्या? चीन से खतरा? 

पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गाँव मिलम तक की सड़क के लिए भी यही तर्क दिया जाता है। पर यह मुद्दा आज तक ठीक से समझ नहीं आया। क्या हम किसी आदम या मध्यकालीन युग में रह रहे हैं कि चीनी सेना पैदल चल कर दर्रों को पार करेगी और सीमावर्ती गाँवों को हथिया लेगी? वह भी ऐसे गाँव जिनका उस पार से प्रबंधन संभव ही नहीं हैं। अगर ऐसा संभव होता तो ये सीमावर्ती क्षेत्र इतिहास में, कुछ बार ही सही, तिब्बत के अधीन तो रह ही चुके होते। पर ऐसा कभी हुआ नहीं।

अगर कभी भारत चीन युद्ध हुआ भी तो इतनी बात तो पक्की है कि वह युद्घ दर्रों में तो नहीं ही होगा। और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस सड़क के कारण हम तेजी से सीमा तक पहुचेंगे, वही सड़क भारत के अंदरूनी इलाकों तक घुसपैठ को भी आसान बनाएगी। सोचने वाली बात यह भी है कि अगर इस सीमा से आक्रमण का इतना ही खतरा होता तो उत्तराखंड में सेना का जमावड़ा होता जैसे अन्य सीमाओं पर है। इसलिए पहाड़ काटने से पहले सड़क के सामरिक महत्व का विश्लेषण होना जरूरी है। अगर कोई खास सामरिक महत्व है ही नहीं, तो जाहिर है चौड़ीकरण के पीछे की एक धारणा खारिज हो जाएगी।

दूसरा प्रश्न
क्या ये सड़क पर्यटन के लिए बन रही है?

आंकड़ों की माने तो वर्ष 2019 में बद्रीनाथ में 12 लाख ओर केदारनाथ में 10 लाख पर्यटक पहुँचे। ये श्रद्धालु पूरे साल समान रूप से नहीं आते। कुछ महीनों में बहुत भीड़ रहती है और कुछ महीनों में सन्नाटा पसरा रहता है।

स्थिति के आँकलन के लिए चलिए मान लेते हैं कि श्रद्धालु साल भर समान रूप से आते हैं अर्थात बद्रीनाथ में हर महीने लगभग 1 लाख लोग आते हैं। औसतन 3500 लोग प्रति दिन। आंकड़ों के हिसाब से हर साल 1.5 से 2 लाख के दर से श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है। पिछले पाँच छह सालों से यह सिलसिला जारी है। इसका मतलब यह हुआ की प्रतिदिन के औसत में हर साल लगभग 500 की वृद्धि हो रही है।

सच पूछिए तो मूल सवाल पहाड़ या पेड़ काटने का है ही नहीं। मूल सवाल तो यह है कि क्या हमारे धाम और उस के आस-आस के गाँव पर्यटकों के इस भार को सह सकते हैं? क्या इस ‘भार’ का कोई विश्लेषण किया गया है? क्या इसे संभालने या इससे जनित मुसीबतों से निपटने की कोई योजना है?

चार लेन का अर्थ तो सीधे-सीधे यह हुआ कि आप ज्यादा से ज्यादा लोगों को कम से कम समय में इन धामों तक पहुँचाना चाहते हैं। सोचिए, एक दिन में 3500 लोग अगर दो लिटर पानी पियेंगे और दो बार शौच जायेंगे तो हर दिन पीने के लिए 7000 लीटर और शौच के लिए 50,000 लीटर पानी की आवश्यकता होगी। ऊपर से हर दिन कम से कम 5000 किलो से अधिक मल का निस्तारण भी करना होगा। और अभी तो खाने-पीने और कूड़े कबाड़ की बात भी शुरू नहीं हुई है।

इन आशावादी आंकड़ों के बारे में हमारी क्या राय है? पर्यावरण पर इसके प्रभाव पर कोई चर्चा?

एक ओर हम मौजूदा भार भी नहीं संभाल पर रहे हैं और दूसरी ओर हम ज्यादा से ज्यादा पर्यटकों को यहाँ लाने के रास्ते खोज रहे हैं। समझ ही नहीं आता कि दरअसल हम चाहते क्या हैं? क्या हम इतनी जल्दी केदारनाथ हादसा भूल गए हैं कि नियंत्रण की जगह गतिवृद्धि चाहते हैं? अगर नहीं, तो चौड़ीकरण के पीछे की दूसरी धारणा खारिज होती दिखाई देती है।

तीसरा प्रश्न
क्या एक ‘आल वेदर’ रोड बन रही है?

इस परियोजना का एक पहलू है ‘ऑल वेदर’ रोड यानि एक ऐसी सड़क जो हर मौसम में खुली रहेगी- इसलिए इसे चौड़ा किया जा रहा है! अर्थात चौड़ी सड़कें बंद नहीं होती, उनमें भूस्खलन का असर नहीं होता चाहे चौड़ीकरण के लिए हजारों पेड़ काट दिया जाएँ और कई मेट्रिक टन पहाड़ ढहा दिया जाए। इतना कुतर्की कोई कैसे हो सकता है? हमारे विशेषज्ञ कार्बन रिलीज के नाम पर जब तर्क देते हैं तो लगता है वहाँ भी कोई झोल है। सीधे सीधे असली मुद्दों पर बात करने में विशेषज्ञों को परेशानी क्या है?

पहाड़ में रहने वाले किसी भी व्यक्ति से पूछिएगा। सड़क वह नहीं टूटती जिसके चारों ओर भूस्खलन नहीं है। और भूस्खलन वहाँ नहीं होता जहाँ पेड़ होते हैं, चट्टानों को अंधाधुंध गिराया नहीं जाता। जे.सी.बी जैसे अर्थ मूवर्स के जोर पर खिसकी चट्टानें धँसेंगी नहीं तो क्या करेंगी? गुरुत्वाकर्षण के नियमों को सरकारी आदेशों से बदला नहीं जा सकता है। ऊपर से नदियों के किनारे सीधी सड़कें बनाने की जिद जब कि उन्हीं नदियों में फैंके मलवे के कारण आए उफान ऐसी सड़कों को कई बार बहा चुके हैं।

सच पूछिए तो हम अभी तक नालियों के बारे में भी अपनी समझ ठीक से बना नहीं पाए हैं। एक हल्की बारिश हमारे नगरों और कस्बों की सड़कों को गड्डामुक्त से गड्डापूर्ण बना देती हैं। ऐसे में ‘आल वेदर’ रोड के पीछे क्या दर्शनशास्त्र काम कर रहा है यह जानना बहुत जरूरी है। और अगर यह एक महज सरकारी या व्यापारिक जिद है तो चौड़ीकरण के पीछे की तीसरी धारणा खारिज होती है।

चौथा प्रश्न
यह किसकी सड़क है?

अब आते हैं सबसे मूल प्रश्न पर। यह सड़क किसकी है? किसके लिए है? इसके बनने से कौन विस्थापित हो रहा है? किसका घर ढह रहा है? कौन मर रहा है? क्या यह सड़क इन पीड़ितों की भी है? और उत्तराखंड के आम लोगों की क्या राय है इस सड़क के मालिकाना हक के बारे में?

सच तो यह है कि लोगों को हमेशा यही बताया गया है कि सड़क का अर्थ विकास होता है। लोग भी शायद यही मानने लगे हैं। कई पर्यावरणविद शायद लोगों की मान्यता के चलते ही चुप्पी साधे बैठे हैं। वे इस नाजुक मसले को छेड़ना नहीं चाहते। कुछ बोलेंगे तो उन पर राजनैतिक कीचड़ उछलेगा जिससे वे शायद डरते हैं या दूरी रखना चाहते है। सोच तार्कित जरूर है पर नैतिक मूल्यों पर खरी नहीं उतरती। सही और तार्किक बात जब बहुमत से डरने लगे तो पर्यावरण का ह्रास तय है।

‘यह सड़क किसकी है’ का उत्तर एक अन्य सवाल से जुड़ा है- उत्तराखंड किसका है? अगर मैदानी इलाकों का बहुमत और ठेकेदारों व व्यवसायियों का अर्थशास्त्र उत्तराखंड का भविष्य तय करेगा तो जाहिर है पर्यावरण का कोई संदर्भ नहीं रह जाएगा।

अतः जरूरी है कि सवाल उत्तराखंड के निवासी उठाएँ, जिनकी यह सड़क है। उन्हें ही तय करना होगा कि क्या जरूरी है और क्या गैरजरूरी। पर्वतीय अंचलों के निवासियों के नाम पर सवाल अगर केवल पर्यावरणविद, सामाजिक संस्थाएँ या प्रवासी ही उठायेंगे तो किसी बदलाव की उम्मीद रखना बेईमानी है। ऐसे में पर्यावरण का बहुमत की भेंट चढ़ जाना निश्चित है।

और अगर उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के निवासी इस सड़क पर अपना मालिकाना हक जताते हुए इसे खारिज कर देते हैं तो चौड़ीकरण की चौथी अहम धारणा भी ध्वस्त हो जाएगी और साथ ही चौड़ीकरण का औचित्य भी।

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