गमरा – भारत व नेपाल की साझी संस्कृति

गमरा उत्सव महाकाली नदी के दोनों ओर,कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल में, मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। गमरा में प्रकॄति और मनुष्य के गहरे व आत्मीय रिश्तों की अभिव्यक्ति होती है। स्त्री केन्द्रित इस उत्सव में समूचा समाज गतिशील होकर एकता की अद्भुद बानगी पेश करता है। यह केवल उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति ही नही वरन् लोकजीवन के उद्भव, विकास और मानवीय संवेदनाओं का आख्यान भी है।

यह लोक उत्सव वर्षाकाल में मनाया जाता है। यह एक ऐसी ऋतु है जो अपने साथ मानव जीवन और खास कर खेतिहर समाजों के लिए नई उमंग ले कर आती है। गर्मी से झुलसाई धरती में वर्षा की फुहारों के आगमन के साथ नये जीवन का संचार होने लगता है। खेतिहर समाजों के जीवन में जहाँ यह समय कठोर श्रम और व्यस्थता ले कर आता है वहीं यह उनकी जिजीविषा, सुख-दुख, हर्ष-उल्लास और उमंग की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनता है। लोक जीवन में प्रकॄति के रहस्यों से उपजे कौतूहल के साथ-साथ इस उत्सव की उमंग में श्रम से उपजी कलात्मकता और श्रम की कला के रोचक बिम्ब देखने को मिलते हैं।  

कुमाऊँ के पिथौरागढ, चंपावत जिलों के सोर, सीरा काली कुमाऊँ के इलाकों में मनाई जाने वाली गमरा कृषि-पशुचारक समाज का उत्सव है। इसका दायरा न केवल कुमाऊँ के सोर, सीरा, काली-कुमाऊँ इलाके में बल्कि सुदूर पश्चिमी नेपाल के महाकाली अंचल के डोटी, बैतड़ी, डंडेलधुरा सहित पश्चिमी और मध्य नेपाल के भी कुछ एक इलाकों तक फैला है। कुमाऊँ और सुदूर पश्चिमी नेपाल में इस उत्सव को गौरा, गोमारा, लाली गमरा कहा जाता है, वहीं पश्चिमी और मध्य नेपाल में थोड़े अलग स्वरूप के साथ यह होबालो नाम से चर्चित है। यह उत्सव अपने स्वरूप में उस भूगोल के समुदायों, कुटुम्बों और वैयक्तिक जीवन में स्त्री की स्थिति के साथ साथ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की असलियत को भी सामने रखता है। नेपाली समाज में मान्यता है कि महाकाली के आरपार रहने वाले समुदायों के बीच सदियों से चले आ रहे वैवाहिक सम्बन्धों ने इस उत्सव को सुदूर पश्चिमी नेपाल में विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुमाऊँ से ब्याह कर लाई गई कन्याओं से साथ यह उत्सव नेपाल में आया और धीरे-धीरे सुदूर पश्चिमी नेपाल की संस्कृति का अभिन्न अंग बनता चला गया।

वर्षा ऋतु में धान के खेतों में रोपाई, गुड़ाई के थकान भरे कामों से जैसे ही किसान थोड़ा फुर्सत पाते हैं, उत्सवों को मनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। सामान्यतः अगस्त महीने में पड़ने वाली बिरुड़ पंचमी के दिन से गमरा जैसे उत्सव की शुरुआत होती है। सबसे पहले महिलाओं द्वारा गाँव के किसी एक घर के पूजा स्थल और आँगन, जहाँ गमरा को लाया जाना है की लिपाई-पुताई कर तैयार किया जाता है। होरे या वसुंधारा देकर उस स्थान को चित्रांकित कर उत्सव के लिए सजाया जाता जाता है। गाँव की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा पाँच या सात अनाजों – गुरुश, कलों, रैंस, गहत, माश (उरद),सवों, गेहूं, जिसे कुमाऊँ में बिरुड़ और नेपाल में बिरौला या बिडौला कहा जाता, को साफ कर सभी परिवारो को बाँटा जाता है। आयोजन में भागीदारी कर रही महिलाएँ इन बीजों को लेकर अपने-अपने घरों को लौटती हैं। यहाँ इन अनाजों को अच्छी तरह धोया जाता है, और फिर भीगने के लिए घर के पूजा स्थल में तांबे के एक बर्तन ‘तौली’ में रख दिया जाता है। तौली को पवित्र रूप देने के लिए बाहर से गाय के गोबर के साथ पाँच स्थानों में दूब और अक्षत-पिठ्या लगाया जाता हैं। कुछ एक गाँवों में इन बिरुड़ों साथ एक पोटली में सुपारी, हल्दी सहित सरसों और गेहूँ के बीज बाँध कर भिगाने  दिये का भी चलन है।

सातों के दिन गमरा उत्सव के मुख्य अनुष्ठान की प्रक्रिया आरम्भ होती है। इस दिन महिलाएँ उपवास के साथ नए कपड़े पहन सिर में बिरुड़ों से भरी तौली लेकर आनुष्ठानिक लोकगीत गाते हुए जलूस की शक्ल में सामूहिक रूप से गाँव के जल स्रोत-नौले या धारे-में जाती हैं। यहाँ पर भी लोकगीतों के साथ बिरुड़ों को धोने का क्रम आरम्भ होता है। पहली बार खेतों में नए उगे हुए धान, बलौं की पाती और सवों के पौधों से ‘गमरा’ बनायी जाती है। इस काम में जानकार महिला या कई बार पुजारी द्वारा गमरा को प्रतिष्ठित कर जल स्रोत के पास एक ऊँचे स्थान में स्थापित कर दिया जाता है। एक बार फिर ‘गमरा’ के जीवन से जुड़े गीतों को गाते हुए महिलाओं का जलूस की शक्ल में घरों को वापस लौटने का क्रम आरम्भ होता है। इस दिन महिलायें विशेष व्रत-उपवास धारण करती  हैं।  

गमरा उत्सव में सातों का सबसे महत्वपूर्ण और उमंग भरा हिस्सा सायंकालीन बेला में आयोजित होने वाले अनुष्ठानों का है। दूसरे गावों में ब्याही गई और इस उत्सव के लिए विशेष रूप से आमंत्रित गाँव की बेटियाँ सायं 4 बजे के आसपास इकठ्ठा हो जलूस की शक्ल में गाँव की अन्य महिलाओं के साथ लोकगीत गाते हुए लहलहाते खेतों के बीच से गुजरते, बलौं की पाती, धान और सवों के पौधे एकत्र करते आगे-आगे नगाड़े की ताल के साथ आयोजन स्थल की ओर बढ़ती हैं। महाकाली नदी के दोनों ओर भारत और नेपाल में ब्याही गई लड़कियों के लिए तो यह उत्सव विशेष महत्व रखता है जो उनके लिए वर्ष में एक बार अपने माता-पिता, परिवार और मित्रों से मिलने का अवसर लेकर आता है।

इस आयोजन का एक अन्य महत्वपूर्ण आकर्षण ‘ठुल खेल’ या सामुहिक नॄत्य हैं जहाँ ग्रामीण समाज गीतों के माध्यम से अपने सुख-दुख को साझा करते हुए मनोरंजन करता है। खेल के गीतों की  विषय वस्तु अपने पति से रुष्ट हो कैलाश पर्वत से अपने पिता के घर की ओर निकली गमरा या गौरा का भटकते हुए रास्ते में पड़ने वाले हर कंकड़-पत्थर, पेड़-पौधे, गाढ़-गधेरे, पशु-पक्षी से अपने मायके को जाने वाले रास्ते के बारे में पूछना जैसे प्रसंगो के चारों ओर घूमती है। इन गीतों में जहाँ पहाड़ में स्त्री जीवन की वेदना, उसकी मनोदशा के साथ-साथ पित्रासत्तात्मक समाज में संघर्षरत स्त्री जीवन के अनेक बिम्ब मिलते हैं, वहीं ये लोकगीत स्थानीय भूगोल और पारिस्थितिकी की विविधता को भी चित्रित करते हैं।

गीतों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बीच गाँव की बेटियों द्वारा एकत्र किए नए उगे धान, सवों, बलों के पौधों से ‘गमरा दीदी’ बनाई जाती है। इस तरह निर्मित की गई गमरा को छापरी (टोकरी) में रख कर नए वस्त्र एवं आभूषणों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इस अवसर पर महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला एक विशेष प्रकार का धागा डोर-दुब्ज्योड, हर घर से लाए गए बिरुड़, मौसमी फल, मकई, और सीक (पुजारी को दी जाने वाली भेट या वस्तु) गमरा को चढ़ाये जाते हैं। तत्पश्चात गमरा को प्रतिष्ठित करने का अनुष्ठान आरम्भ होता है। एक ओर गमरा के आव्हान की प्रक्रिया चल रही होती है तो दूसरी ओर बाखली में इकठ्ठा ग्रामीण बड़े बड़े वॄत्ताकार समूहों में ‘खेल’ लगाने याने पारम्परिक लोकगीतों की धुनों में थिरकना आरम्भ करते है। इस तरह पहले दिन का आयोजन सम्पन्न होता है। उल्लास का यह क्रम अगले दिन भी उसी तरह बना रहता है।

दूसरे दिन आठों का आयोजन होता है। आज मैशर को भी लाया जाना है। गाँव की बुजुर्ग स्त्रियाँ बालिकाओं को मैशर भीना को लाये जाने का आग्रह करती है। एक बार फिर लड़कियाँ खेतों में जा कर वही धान, बलों, सवों के पौधों से निर्मित मैशर को पूजा स्थल तक लेकर आती हैं। एक दूसरी छापरी में मैशर को गमरा के बगल में स्थापित किया जाता है। गाँव के पुजारी द्वारा गमरा-मैशर विवाह के अनुष्ठान आरम्भ किए जाते हैं।  सामान्यतः घर के पटागण में दरी और चादर बिछा कर गमरा-मैशर की छापरियों को बीच में रखा जाता है। महिलाओं द्वारा लोक आनुष्ठानिक गीतों का सिलसिला जारी रहता है। अनुष्ठान सम्पन्न होने के पश्चात सबसे पहले हर महिला को गमरा की छापरी में प्रतिष्ठित किए गए डोर धागे दिये जाते उसके पश्चात एक अनूठे ढंग से प्रसाद वितरण किया जाता है। गमरा-मैशर को अर्पित किए गए फलों इत्यादि को एक बड़ी चादर में डालकर ऊपर की ओर उछला जाता है इसे फल या खौल फटकना कहा जाता है। महिलाये अपना आँचल फैलाये नीचे की ओर गिरते फल इत्यादि को सहेजने को तत्पर रहती हैं। अब मनोरंजन के लिए ननद-भाभियों के बीच बिरुड के बीच रखी गई पोटली को छुपाने और ढूंढने के खेल की बारी है।

पटांगण के दूसरे छोर में गाँव के युवक-युवतियाँ सामूहिक नॄत्य ‘ठुल खेल’ आरंभ करती हैं। गमरा के इन गीतों में बकरियाँ चरा रही गमरा और नदी के उस पार भैंस के ग्वाले आए मैशर के आकर्षित होकर प्रणय निवेदन करने और गमरा द्वारा बिना पिता की सहमति के कदम न बढ़ाने जैसे प्रसंग भी उभरते हैं। दरअसल ऐसे प्रसंग उन्मुक्त ग्रामीण जीवन में युवक-युवती के परस्पर सम्बन्धों की शालीनता को प्रतिबिम्बित करते हैं। यही नहीं ‘मेरि हिरु न्ह्येगे रंगीला भाबरा’ जैसे ठुल खेल के गीतों में भी नायक की नायिका के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति की ऐसी ही झलक दिखाई पड़ती है। आठों के दिन ढुस्का और ठुलखेल के गीतों के साथ लयबद्ध नॄत्य और गायन का यह सिलसिला देर रात्रि तक चलता चला जाता है। आयोजन की समाप्ति पर ढोल-दमाऊं, मशक बीन आदि वाद्य-यंत्रों की धुन के साथ महिलायें ‘गमरा-मैशर’ को सिर में रखकर गाँव में घुमाते हुए नौलों, धारों या मंदिर में विसर्जित करने के लिए ले जाती हैं। इस तरह सातों आठों का पर्व उमंग और उल्लास के साथ सम्पन्न होता है। कुमोड़ जैसे गावों में गमरा का विसर्जन हिलजातरा सम्पन्न होने के बाद किए जाने के परम्परा है।

यह उल्लेखनीय है कि मध्य और पश्चिमी नेपाल में पहुँचते-पहुँचते यह उत्सव होबालो के रूप में एक नए कथानक के साथ समाज का हिस्सा बनता है। यहाँ होबालो का तात्पर्य एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के लिए मंगलकामना करना है। मान्यता है कि यह उत्सव कुमाउनी बहुओं के साथ आई गमरा परम्परा का परिवर्तित रूप है जो पर्वत इलाके के लिथियाना, फ़ौलेबासा, मूलपानी, पाल्पा जिले में लम्झुंग, छिड़ी, बेसिसहर, ग्याजा और बझाङ्ग के गैड़ा गाँव की तरह कुमाऊँनी समुदायों के साथ काठमांडू घाटी तक चला गया।

होबालो का मुख्य कथानक गमरा की ही तरह मैशर या महेशर और गौरा के विवाह से जुड़ा है। लोक मान्यता है कि कॄष्ण ने युधिष्टिर को अपने माता पिता की सातों-संतानों के कंस के हाथों मारे जाने की भावुक कथा सुनाते हुए बताया कि होबालो (महेशर और गौरा के विवाह पूजा) का आयोजन उनके माता-पिता के लिए सौभाग्य लेकर आया। इसीलिए यह पर्व सौभाग्य और बुरी शक्तियों पर अच्छी शक्तियों की विजय का सूचक है।

यह एक तरह से स्त्री प्रधान उत्सव है। जहाँ गमरा में केवल विवाहित स्त्रियाँ  ही उपवास धारण करती और अनुष्ठान सम्पन्न करती है, होबालो में अविवाहित स्त्रियाँ को भी हिस्सेदारी करने की छूट होती है। होबालो अनुष्ठान की शुरुआत भी बिरुड़े भिगाने से, जिसे स्थानीय बोली में ‘बिरुला भिजओने’ कहा जाता है, की जाती है। लगभग सात माणे (3.5 किलोग्राम) बिरुला पात्र में डाले जाते हैं । पात्र को अक्षत, पिठया आदि लगाया जाता है और पास में सात गट्टे (छोटे गोल पत्थर) रखे जाते है जिनसे अनुष्ठान के अंतिम दिन महिलायें खेल आयोजित करती हैं। षष्टि तिथि को पाती और कुश के गौरा और महेशर के पुतलों का निर्माण किया जाता है और दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाया संवारा जाता है। सप्तमी को कुछ एक अनुष्ठानों के साथ महिलायें सात गाँठ लगे डोर या पवित्र धागे को सौभाग्य सूचक के रूप में  गले में धारण करती हैं। इस दिन बिना पका हुआ भोजन ग्रहण किया जाता है। होबालो के लिए अष्टमी या आठों का दिन महत्वपूर्ण होता है। इस दिन गौरा या लाली गौरा और महेशर का विवाह आयोजित किया जाता है।

अंतिम चरण में लोक कथा और लोक गीतों के गायन, जिसमे होबालो का बार बार उच्चारण दोहराते हुए अनुष्ठान सम्पन्न होता है। होबालो कथा में विधिवत अनुष्ठान न करने वाली सुसंपन्न और अहंकार से भरी रानी राजमती के बुरे दिनों और बीजमती नामक ब्राह्मणी द्वारा श्रद्धा से अनुष्ठान सम्पन्न करने पर आई सुख समॄद्धि और सौभाग्य का सजीव चित्रण किया जाता है। यह रोचक है कि कहानी का सुखांत समापन होता है। ज्यों ही रानी राजमती को अपने अहंकार का भान होता है वह भी स्वर्ण डोर त्याग कर पवित्र डोर धारण करते हुए विधिवत अनुष्ठान सम्पन्न करती है। इस तरह उसके भी सुख भरे दिन लौट आते हैं। 

देखा जाय तो जहाँ गमरा कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल की सदियों से चली आ रही साझी संस्कृति का जीवंत प्रमाण है, यह पित्रसत्तात्मक समाज में स्त्री की गैर-बराबरी और अपने जीवन के बारे में फैसला न लेने सकने के अधिकार की कहानी भी है।

ये उत्सव बताते हैं की संघर्ष भरे जीवन में यहाँ के समाज ने जहाँ एक ओर प्रकॄति के रहस्यों से अचंभित हो अदॄश्य शक्तियों की पूजा अर्चना की, वहीं कर्मकांडों की आड़ में अंततः उन रूढ़ियों को भी बनाए रखा जो गैर बराबरी वाले सामंती उत्पादन संबंधों को बनाए रखना चाहती थी। यही नहीं शायद उत्सवों के पौराणिक रहस्यवाद ने एक इंसान के रूप में महिलाओं को दोयम समझने व पुरुष आश्रित बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाई है।


गमरा उत्सव पर हमने एक छोटी सी फिल्म भी बनाई है जिससे हम पाठकों को इस उत्सव की एक झलक दिखा सकें। 

गिरिजा पांडे
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