कुली बेगार आंदोलन के सौ वर्ष

13 जनवरी, 1921 की दोपहर। बागेश्वर बाज़ार में जबर्दस्त चहलपहल थी। दो-तीन दिन से सरयू बगड़ में होने वाले उत्तरायणी कौतीक के लिए कत्यूर घाटी समेत कुमाऊँ के दूर दराज इलाकों से हजारों लोग बागेश्वर में जुटे थे। हाथों में कुली ‘उतार बंद करो’ लिखे बैनर लिए और ‘भारत माता की जय’, ‘महात्मा गाँधी की जय’, ‘बंदे मातरम्’ के नारे लगाते हुए लोग बागेश्वर बाज़ार में जलूस निकाल रहे थे। जलूस बाजार से होता हुआ सरयू बगड़ में नदी के किनारे मेला स्थल की ओर बढ़ रहा था। तत्कालीन दस्तावेज बताते हैं कि बाज़ार में दोनों ओर मकान की कतारों में छज्जों, बरामदों, दरवाजों में बड़ी संख्या में खड़ी महिलाएँ, बच्चे व बूढ़े इस जुलूस को उत्सुकतावश देख रहे थे। इस जलूस में हिस्सेदारी कर रहे आंदोलनकारियों में जबर्दस्त उत्साह था। इलाके के प्रभावशाली नेता, खास तौर पर मोहन सिंह मेहता, हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल और बद्रीदत्त पांडे बीच-बीच में अपने उत्तेजक भाषणों से आंदोलनकारियों और मेले में हिस्सेदारी करने आई ग्रामीण जनता को उद्वेलित और सोचने के लिए मजबूर करने में लगे थे। दोपहर एक बजे के आसपास यह जलूस मेला स्थल में पहुँच कर एक विशाल जनसभा में तब्दील हो गया।

आज से ठीक सौ साल पहले, दस हजार से ज्यादा काश्तकार-किसान इस सभा में इकठ्ठा होकर ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध कर रहे थे। सभा में जोश भरने के लिए बद्रीदत्त पांडे ने आक्रामक भाषण देते हुए कहा –

“हमारे बीच के लोग सुबह पूजा करने की जगह उस मक्कड़ दरबार में जा रहे हैं। ये लोग जनता की स्थिति बताने की जगह अपने लड़कों के लिए कलक्टरी, तहसीलदारी का बंदोबस्त कर रहे हैं। गाँधी ने नागपुर काँग्रेस से आप सबको संदेश भेजा है कि बेगार न दें। कुली न बने और साहबों को अपनी व्यवस्था खुद करने को मजबूर करें। चाहे कोई मेरे काट-काट कर टुकड़े कर दे या गोली मार दे पर मैं कुली नहीं बनूँगा। आप सब मेरा अनुकरण करें। यही स्वराज की दिशा में पहला कदम है।”

सभा को संबोधित करते श्री बद्रीदत्त पांडे

देखते ही देखते सभा में उपस्थित ग्राम प्रधानों/थोकदारों समेत कई मालगुजारों ने बेगार से जुड़े कुली रजिस्टर सरयू नदी में बहा डाले। यह घटना अंग्रेज सरकार द्वारा अपने नागरिकों के खिलाफ अपनाई जा रही शोषक और अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध उत्तराखंड के किसानों के व्यापक प्रतिरोध की पहली संगठित अभिव्यक्ति थी। यह उल्लेखनीय है कि इस प्रतिरोध के बाद न तो किसानों ने कभी बेगार दी, और न ही औपनिवेशिक सत्ता ने कभी बेगार के लिए काश्तकारों को विवश किया। सरकार ने बेगार प्रथा समाप्त किए जाने की कोई औपचारिक घोषणा भी नहीं की। यह एक प्रकार से सरकार द्वारा किसानों की मांगों की मूक स्वीकृति ही थी।

देखा जाए तो किसान हमेशा ही राज्य के निशाने पर रहे हैं। औपनिवेशिक शासन के दौरान तो समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में सत्ता के शोषण का सबसे ज्यादा कहर किसानों पर ही बरपा था। ब्रिटिश भारत में भू-स्वामित्व, भू-राजस्व या फिर जबरन एक खास क़िस्म की खेती कराये जाने को लेकर सरकार ने, किसानों के न चाहने के बावजूद, मनमाने कानून थोपने शुरू किये। इन कानूनों का पालन करने को एक ओर मजबूर किये गए काश्तकार लगातार आर्थिक रूप से बदहाल होने लगे थे तो दूसरी ओर कानूनों की अवहेलना करने वाले किसान ब्रिटिश प्रशासन की दमनात्मक कारवाहियों का शिकार हो रहे थे। इन असामान्य हालातों ने किसानों को अन्दर तक बेचैन कर डाला था। किसानों की छटपटाहट और व्यापक संतोष को 19वीं सदी के उत्तरार्ध में देश में हुए नील आन्दोलन से लेकर पावना आन्दोलन या फिर दक्षिण के किसान विद्रोहों में देखा जा सकता है।

20वीं सदी में किसानों की ऐसी ही छटपटाहट उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाके के काश्तकारों में भी दिखाई पड़ती है। यह बेचैनी तीसरे दशक के आते-आते व्यापक और एक संगठित आंदोलन में प्रस्फुटित हुई जिसे कुली बेगार आंदोलन के नाम से जाना गया। यह एक ऐसा आंदोलन था जिसने विदेशी सत्ता के उत्पीड़क और अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ स्थानीय समाज को उठ खड़े होने के लिए विवश किया और अंततः जनता ने जीत हासिल की।

यह वर्ष (2021) उत्तराखंड में कुली बेगार तो अवध में किसान या एका आंदोलन और मालाबार(केरल) में माप्पीला विद्रोह की शताब्दी का भी वर्ष है। पिछले ही वर्ष असहयोग आंदोलन को सौ साल पूरे हुए हैं। आज जब दुनिया में असमानता और अधिनायकवाद के खिलाफ प्रतिरोधों की असाधारण लहर उठ रही हैं, उत्तराखंड का कुली बेगार आन्दोलन हमें सामाजिक चेतना की विभिन्न परतों और संघर्ष को समझने के साथ-साथ भारत में सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों के व्यापक फलक में पिछली सदी के किसान आन्दोलनों के स्वरुप, संगठन और संरचना और इसके अंतर्संबंधों को वर्तमान संदर्भों में समझने में मदद करता है।

1922 में देहरादून जेल से छूटने के बाद ‘गढ़वाली’ के संपादक चंदोला और कुमाऊँनी कवि गौर्दा के साथ बद्रीदत्त पांडे 

बेगार वस्तुतः एक ऐसा श्रम था जो बिना श्रम का मूल्य दिये या कम मजदूरी देकर जबरन करवाया जाता था। इस तरह का श्रम सामान्यतः तीन तरीकों से लिया जाता था। कुली बर्दायश, कुली उतार और कुली बेगार। जहाँ कुली बर्दायश, इलाके के दौरे पर आ रहे अंग्रेज़ अधिकारियों, सर्वेयरों, शिकारियों, सैलानियों या सैनिक टुकड़ियों के लिए व्यवस्थाओं हेतु मुफ्त में सामग्री जुटाये जाने के लिए लिया जाता था, वहीं ‘कुली उतार’ काम करवाए जाने के एवज में बहुत कम मजदूरी का भुगतान दिये जाने की परंपरा थी। इनमें  सर्वाधिक शोषक ‘कुली बेगार’ प्रथा थी जिसमें व्यक्ति को बिना मजदूरी दिये काम करने को विवश किया जाता था।

यूँ तो ‘कुली बर्दायश’ और ‘कुली उतार’ में श्रम की न्यूनतम कीमत चुकाए जाने की अपेक्षा की जाती थी, लेकिन सामान्य तौर पर ऐसे कार्य भी बिना किसी भुगतान के करवा लिए जाते थे। जोर जबरदस्ती, धोखाधड़ी और शोषण इस प्रथा में अंतर्निहित था। पूर्व-औपनिवेशिक युग से चली आ रही बेगार प्रथा ने ब्रिटिश शासन के दौर में और अधिक अमानवीय चेहरा दिखाया। किसानों के शोषण का दुष्चक्र इस दौर में किसी न किसी रूप में देश के हर हिस्से में दिखाई पड़ता है, जिसके खिलाफ समय-समय पर आवाजें उठती रही।

19वीं सदी में सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ भारत के किसान कसमसाने और धीरे-धीरे संगठित होने लगे थे। बंगाल में नील आंदोलन को ही देख लें। नील का कारोबार करने वाले यूरोपीय नील की खेती करने के लिए किसानों को विवश किया करते थे । जबरन खेती करवाये जाने के लिए किसानों का अपहरण करना, कोड़े मारना, लूटपाट करवाना, बच्चों-महिलाओं की पिटाई करवाना, घर और खड़ी फसलों को आग लगा कर नष्ट देना जैसे तरीके अपनाए जाने लगे ताकि विवश हो कर किसान नील की खेती ही करें। ठीक इसी तरह लागू किए गए भूमि कानूनों के कारण ज़मीनों से अपनी बेदखली से घबराए किसानों ने पावना आन्दोलन कर डाला। वस्तुतः ये आंदोलन मूलतः अपने सामाजिक-आर्थिक उत्पीड़न के खिलाफ किसानों का आक्रोश और विद्रोह था क्योंकि किसान नए कानूनों को राज्य द्वारा उनकी पारंपरिक जीवन शैली में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे थे।

किसान असंतोषों के संदर्भ में यहाँ पर इस बात को रेखांकित किया जाना उचित होगा कि किसानों ने अपने शोषण की परंपरागत संस्थाओं को कभी चुनौती नहीं दी। वे ज़मीनों पर अपने मालिकाना हक या फिर जमींदारों व मालगुजारों द्वारा उगाहे जाने वाले करों के लिए बने ढ़ाचे के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रहे थे। किसानों का संघर्ष तो ब्रिटिश नीतियों के कारण फसलों की गिरती कीमतों और लगातार बढ़ते भू राजस्व के खिलाफ था। यह भी उल्लेखनीय है कि किसान कितने भी जुझारू क्यों न रहे हों, उन्होंने अपने संघर्ष का आधार उसी ढांचे को बनाया था जो परंपरागत मान्यताओं पर आधारित था और जिसकी बुनियाद में मजबूत जमीदार-किसान संबंध थे।

वर्तमान में बागेश्वर

कुली बेगार आंदोलन से अपनी बात को विस्तार देते हैं। तत्कालीन भारत में हो रही इन हलचलों का शुरुआत में उत्तराखंड में कोई व्यापक प्रभाव नहीं था। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि अंग्रेजों ने शुरुआती दौर में प्रभावशाली सामाजिक वर्गों द्वारा स्थापित परंपरागत शासन व्यवस्था को बिना किसी बदलाव के जस का तस अपनाते हुए यहाँ के सामाजिक और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली वर्गों और गुटों के साथ ऐसे संबंध स्थापित किए कि वे इसमें छिपी औपनिवेशिक चालाकी को समझ ही नहीं पाये।

1814-16 के बीच नेपाल युद्ध के समय उत्तराखंड के समाज ने गोरखाओं के अमानवीय और अत्याचारपूर्ण शासन से निजात पाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को रसद पहुँचाने के लिए स्वयं कुलियों की व्यवस्था करने में अहम भूमिका निभाई थी। 1815 में यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की स्थापना से लेकर अगले साठ-सत्तर सालों तक इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ किसी बड़े असंतोष के स्वर उभरते दिखाई नहीं देते हैं।

19वीं शताब्दी के चौथे और पाँचवे दशक में, 1857 के विद्रोह से पहले, यदि कुछ एक घटनाओं, जैसे 1830 में लोहाघाट और 1832 में सरकारी आदेशों के बावजूद पिथौरागढ़ में कुलियों का सैनिक बैरकों के निर्माण के लिए न आना, 1841 में कम मजदूरी दिये जाने पर उसे लेने से इंकार कर देना, और इसी तरह सोमेश्वर घाटी के किसानों द्वारा कमिश्नर रैमजे के आदेशों का पालन करने से इंकार कर देना व इस अवहेलना के लिए ₹500 का जुर्माना भुगतने जैसी घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो बेगार के विरुद्ध कोई सशक्त प्रतिरोध यहाँ के जनमानस में नहीं दिखाई पड़ता है। गौर से देखें तो कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि स्थानीय समाज का प्रभावशाली तबका बेगार की अति और प्रशासनिक अधिकारियों तथा प्रधानों के अमानवीय रवैये पर तो रोक लगाना चाहता था पर अपने हितों को ध्यान में रखते हुए इसके समूल उन्मूलन से बचे भी रहना चाहता था। खास तौर पर दलितों व अन्य कमजोर तबकों को बेगार से मुक्ति दिलाने में उसे कोई रुचि नहीं थी। वह तो इस बात का हिमायती था कि बेगार इन्ही वर्गों से ली जानी चाहिए। शायद यही एक कारण था कि 19वीं सदी के अंत तक उत्तराखंड में औपनिवेशिक शासन विरोधी सामाजिक-राजनैतिक चेतना में बेगार जैसी उत्पीड़क प्रथा कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी।

उत्तराखंड में बेगार विरोध की आवाजें पहली बार 1893 में कांग्रेस के अधिवेशन और गवर्नर जनरल काउंसिल में उठाए जा रहे प्रश्नों में दिखाई पड़ती है। यहीं से उत्तराखंड के कस्बाई समाज में औपनिवेशिक सत्ता को लेकर संगठित विरोध की चेतना के स्वर उभरने लगते हैं। 1903 में अलमोड़ा के खत्याड़ी गाँव के लोगों द्वारा बेगार देने से मना करना इस असंतोष की पहली बड़ी अभिव्यक्ति थी। सरकार द्वारा इस नाफ़रमानी के लिए 14 लोगों को ₹2 रुपया जुर्माना या कैद की सजा सुनाई गयी थी। हालांकि इसके विरुद्ध ग्रामीणों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की और जीत हासिल की। न्यायालय ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था। बेगार को लेकर सरकार के नजरिए का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता था कि न्यायालय के निर्णय के बावजूद ब्रिटिश सरकार काउंसिल में बेगार को बनाए रखने के लिए कानून पास करने की लगातार कोशिश करती रही यद्यपि गवर्नर जनरल ने इसकी स्वीकृति नहीं दी।

20वीं सदी की शुरुआत से औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्थानीय अभिजन में विकसित हो रही सामाजिक चेतना के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे कुली बेगार के विरुद्ध संगठित चेतना का उभार होते हुए दिखाई पड़ता है। 1907 में अल्मोड़ा में बेगार विरोधी सभा का आयोजन, श्रीनगर गढ़वाल में जनता द्वारा डिप्टी कमिश्नर को बेगार समाप्त किए जाने के लिए ज्ञापन दिया जाना, विकसित हो रही इस संगठित चेतना की ओर इशारा करते है। यूँ तो कस्बाई आंदोलनरत् समूहों द्वारा संघर्ष के लिए जागरूकता पैदा करने का काम बैठकों, पर्चों, जगह-जगह स्थानीय स्तर पर सभायें आयोजित करके किया जाने लगा था, फिर भी वह यह नहीं समझ पा रहा था कि बिना ग्रामीण काश्तकारों की भागीदारी के इस आन्दोलन का सफल होना कठिन था। जॉन हीवेट या मेस्टन सरीखे प्रांतीय गवर्नरों द्वारा सार्वजनिक रूप से बेगार का समर्थन करना और इसे काश्तकारों के हित में बताया जाना सरकार के नजरिए और भविष्य के संघर्ष की जटिलता का स्पष्ट संकेत थे।

1913 में सरकार की ओर से अल्मोड़ा के आसपास के गावों में कुली उतार लगाने की घोषणा हुई और जनता की ओर से इसका कड़ा विरोध हुआ। इस निर्णय को लेकर स्थानीय शिष्टमंडल ने कमिश्नर के सामने विरोध प्रदर्शित करते हुए इसे वापस लेने की मांग की, लेकिन कमिश्नर ने बेगार समाप्त करने से साफ़ इनकार कर दिया था। बेगार को लेकर लगातार बढ़ रहे असंतोष को देखते हुए सरकार ने नियमों में संशोधन की संभावनाएँ और आन्दोलन को कमजोर करने के तरीके खोजने शुरू किये। कुली एजेंसियों का गठन कर सरकार और आंदोलनरत काश्तकारों के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश की गई जो बड़ी सीमा तक सफल भी हुई। 

बेगार आन्दोलन की सक्रियताओं के चलते अब एक राजनैतिक संगठन की आवश्यकता भी महसूस की जाने लगी थी। स्थानीय समाचार पत्रों में लगातार छप रही बेगार विरोधी खबरों और लेखों ने इस विचार को और मजबूती दी। परिणामस्वरूप 1916 में कुमाऊँ परिषद् का गठन हुआ जिसने खुल कर स्थानीय मुद्दों को सांगठनिक आवाज़ देना शुरू किया। 

1920 में कुमाऊँ से कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में भाग लेकर और गांधी द्वारा बेगार न देने का संदेश लेकर लौटे कुमाऊँ परिषद् के सदस्यों के उत्साह और सक्रियता का परिणाम यह हुआ कि 1920 तक आते-आते बेगार विरोधी चेतना अपने चरम में पहुँच गई। 1918 में चमोली, बेरीनाग, गंगोलीहाट, आदि स्थानों में ग्रामीणों ने बेगार देने से साफ़ मना कर दिया। हालांकि प्रथम विश्वयुद्ध ने कुछ समय के लिए इस सक्रियता को शिथिल अवश्य किया था फिर भी 1919 में बानड़ी देवी की सभा में बेगार विरोधी तेवर देखे जा सकते थे। इसी साल अक्टूबर में मझेड़ा और दिसंबर में कोटद्वार में परिषद् की बैठक और सहारनपुर में आयोजित संयुक्त प्रांतीय सभा की बैठक में बेगार के विरोध में प्रस्ताव पारित किये गए। 1920 के आते-आते बेगार विरोध की यह चेतना काफी प्रखर हो चुकी थी और स्थानीय नेतृत्व द्वारा उत्तराखंड की जनता से बेगार-बर्दयाश देने से साफ़ इनकार करने आह्वान किया जाने लगा। दिसंबर 1920 को काशीपुर में हुआ कुमाऊँ परिषद् का चौथा अधिवेशन बेगार आन्दोलन के सन्दर्भ में मील का पत्थर साबित हुआ। इस अधिवेशन में सरकारपरस्तों के न चाहने के बावजूद बेगार के विरुद्ध असहयोग किये जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। 

सरयू का तट 

13 जनवरी, 1921 को बेगार के खिलाफ बागेश्वर में जनप्रतिरोध की सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्ति देखने को मिली। विरोध का यह क्रम अगले कुछ दिन तक इसी तरह चलता रहा। धीरे धीरे यह खबर सुदूर गाँवों तक फ़ैलती चली गई और बेगार के विरोध में व्यापक चेतना का प्रसार होता गया। यह उल्लेखनीय है की आने वाले कुछ महीनों में स्थानीय मुद्दों को लेकर विकसित हुई यह जनचेतना नए मुद्दों के साथ आगे बढ़ी और अंततः स्वाधीनता संघर्ष में समाहित होकर उत्तराखंड में राष्ट्रीय संग्राम का हिस्सा बनी। हालांकि काश्तकारों ने एक तरह से 1920 के बाद बेगार देना बंद कर दिया था फिर भी प्रधानों/थोकदारों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से काश्तकारों का शोषण जारी रहा और बेगार का पूर्ण उन्मूलन देश की आजादी के बाद ही हो सका।

गिरिजा पांडे
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