मनुष्य भी रहते हैं इस देवभूमि में

डॉ नवीन जुयाल ने बड़ी आसानी से एक बहुत बड़ी बात हमारे समक्ष रखी है। उनका कहना है कि सब लोग उत्तराखंड को देवभूमि कहते है और हम आत्ममुग्धता के गुब्बारे से फूले रहते हैं। असलियत यह है कि उत्तराखंड में मनुष्य भी रहते हैं जिनकी अपनी जरूरतें हैं, अपने सरोकार हैं। इस धरा से उनके भी जुड़ाव के मुद्दे हैं। जब हम देवभूमि जैसे ‘जार्गन’ का इस्तेमाल करते हैं तो हम खुद ही अपने मुद्दों से मुँह फेर कर आत्ममुग्धता की स्थिति में आ जाते हैं।

डॉ. नवीन जुयाल जाने माने भूवैज्ञानिक हैं। हाल ही में ‘चारधाम मार्ग का पुनरुद्धार’ परियोजना पर पर्यावरणविदों के रुख से व्यथित हो कर उन्होंने ईमेल से माध्यम कुछ पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को एक पत्र लिखा:

“दुःख होता है यह देखकर कि उत्तराखंड में इतनी संस्थाएँ पर्यावरण के क्षेत्र में लगी हैं पर एक-दो को छोड़, सबके मुँह में ताला लगा हुआ है। यहाँ तक कि भागीरथी ईको सेन्सिटिव ज़ोन मास्टर प्लान पास हो गया है, बिना विशेषज्ञों की सहमति के। कितना बड़ा धोखा है, पर आश्चर्य कि कमेटी के कुछ सदस्यों को छोड़ कर, बाकी लोग चुप्पी साधे हुए हैं।”

“आज हम सब के आस-पास पहाड़ अंधकारमय दिख रहा है, लोगों की जान जा रही है पर हम खामोश हैं। सब लोगों ने मुँह बंद कर रखा है। क्या पर्यावरण संवर्धन महज एक अकादमिक कवायद भर रह गई है? 5 जून तो पेड़ लगाओ और भूल जाओ।”

“बहुत जल्दी यह सवाल उत्तराखंड की जनता हम सबसे पूछेगी – चार धाम परियोजना किस कीमत पर और किसके लिए है। पहाड़ और यहाँ के निवासियों के हालात देखकर मैं अंदर तक दहल गया हूँ।

यह पत्र कई अहम सवाल उठाता है पर कई चीजें साफ नहीं है अतः विषय की गहराई में उतरने के लिए हमने डॉ. नवीन जुयाल से बातचीत की।

ज्ञानिमा :चार धाम परियोजना को लेकर जो चुप्पी है उससे व्यथित हो कर आपने कुछ पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को को एक ईमेल लिखा। इन सभी लोगों को मेल भेजने के पीछे क्या वज़ह है?

जिन लोगों को मैंने ईमेल लिखा उन शख्सियतों का मेरे व्यक्तित्व को तराशने में काफी योगदान रहा है। ये मेरे अपने हैं। मुझे लगता है कि ये लोग चारधाम परियोजना के घातक पहलुओं पर अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ मुखर नहीं हैं, अतः मैंने उन्हें पत्र लिखा। मैं समझता हूँ कि उनसे नाराजगी जाहिर करना मेरा हक है। हिमालय के मुद्दों पर मैं कई बार बहुत भावुक हो जाता हूँ। मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने मेरी भावनाओं को अच्छे से समझा। पर मैं यह भी मानता हूँ कि संवेदनशील हिमालय के मामले में भावना से अधिक विवेक और संयम की ज़रूरत है।

ज्ञानिमा : उत्तराखंड के विषय में आपने सबसे पहला रिसर्च ‘उत्तराखंड प्रोजेक्ट– अ रिस्की वेन्चर इन हाइयर हिमालय’ (उत्तराखंड परियोजना – उच्च हिमालय का एक जोखिम भरा उपक्रम) 1985 में श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी के साथ किया था। उत्तराखंड पर आपका अगला रिसर्च एक दशक बाद छपा। इस एक दशक में क्या कुछ बदला?

एक दशक की इस देरी में कुछ व्यक्तिगत कारण थे, कुछ काम की मज़बूरियाँ और कुछ व्यक्तित्वों से मोहभंग की स्थिति। इस अंतराल को मैंने अपने को विज्ञान की समझ विकसित करने में लगाया। विज्ञान के क्षेत्र में बने रहने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। कहते हैं कि संवेदनशील व्यक्ति के जीवन को आप दो भागों में बाँट सकते हैं- एक भाग सक्रिय भागीदारी का और दूसरा भाग सक्रियता की तैयारी का। वह दशक मेरे लिए अपने आप को एक ठीक समझ वाले वैज्ञानिक के रूप में विकसित करने का समय था। यह मूल्यांकन तो समय करेगा कि मैं इसमें कितना सफल रहा परन्तु यह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल रहा।

ज्ञानिमा : आपने वर्ष 2000 के बाद अपने रिसर्च के लिए फिर उत्तराखंड की ओर रुख किया। क्या इसकी कोई खास वजह थी?

अहमदाबाद में रहकर मैं उतनी सक्रियता से हिमालय पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकता था पर उस बीच कुछ नौज़वान साथियों से संपर्क हुआ जो हिमालय की संवेदनशीलता को समझने की कोशिश कर रहे थे। इनमें उत्तराखंड आन्दोलन में अग्रणी भूमिका में रहा डॉ. एस.पी. सती प्रमुख है। उनके साथ एक टीम बन गयी तो मुझे भी पुनः सक्रिय होने का रास्ता मिल गया।

ज्ञानिमा : आप शुरूआत से ही पर्यावरणविदों के संपर्क में रहे और उनके साथ काम भी किया। इन वर्षों में आपने पर्यावरणविदों के काम के तौर तरीकों में क्या बदलाव देखा?

यह बहुत अच्छा प्रश्न है। उत्तराखंड में पर्यावरण आन्दोलनों की समृद्ध परम्परा रही है परन्तु अधिकतर मुद्दों पर आन्दोलन सीधे जन सरोकारों से जुड़े थे। मसलन चिपको आन्दोलन पर्यावरण से अधिक स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय निवासियों के हक-हकूकों से सम्बंधित था। इसी तरह बाँध विरोध डूब क्षेत्र के प्रभावितों की समस्याओं को लेकर अधिक थे। इन आन्दोलनों के प्रत्युत्तर में सत्ताओं के प्रतिनिधियों और ठेकेदारों के गुर्गों ने आन्दोलनकारियों को आसानी से विकास विरोधी साबित कर दिया। इन चालाकियों के दम पर वे लोग आन्दोलनकारियों के खिलाफ अवधारणायें बनाने में सफल रहे। हम इस बात को समझते थे। लिहाजा हमने विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों पर रिसर्च बेस्ड प्रश्न उठाने शुरू किए। अकाट्य वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित तर्कों पर वे लोग बैकफुट पर आ गए जो पहले हर पर्यावरणीय आन्दोलन को सतही साबित करने में जुटे रहते थे। यह मेरी दृष्टि में एक ‘पैराडाइग्म शिफ्ट’ है।

पर्यावरण के क्षेत्र में एक्टिविस्ट्स की स्थिति में अंतर के बारे में मुझे लगता है कि पहले इस तरह के आन्दोलनों में पर्याप्त जनसहभागिता देखी जाती थी पर अब का एक्टिवविज्म कागजी और मीडिया में ज्यादा होता है। पर्यावारणवादी नपे तुले तौर पर किसी बड़े पुरस्कार की दौड़ में व्यस्त रहते हैं।

ज्ञानिमा : क्या आपको लगता कि कुछ पर्यावरणविदों का झुकाव गलत पक्ष की ओर है, या वे गलत पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? अगर हाँ, तो इस विश्वासघात का फैलाव कितना है?

मैं इतना कह सकता हूँ कि कुछ विशाल व्यक्तित्वों की भूमिका संदिग्ध अवश्य रही है। वे इस तरह के मुद्दे पर ध्यान भटकाते हैं जिससे मूल प्रश्न भी गौण हो जाए और दोषी से सीधा टकराव से भी बच जाए। मसलन पिछले कुछ वर्षों से हिमालय दिवस मनाया जा रहा है। सितम्बर माह के शुरू होते ही हिमालय बचाने की प्रतिज्ञाओं की बाढ़ आ जाती है। यह कोई नहीं पूछता है कि पिछले साल जो प्रतिज्ञा की थी उसके बाद आपने कितना हिमालय बचाया? हिमालय बचाने की कसम खाने के बाद चारधाम परियोजना, बांधों से तबाही, जनता और जंगलों के परस्पर संबंधों पर चोट वाली नीतियाँ जैसे मुद्दों पर पर्यावरणवादी चुप हो जाते हैं। इसकी एवज में सरकार भी पर्यावरणवादियों के हिमालय दिवस उत्सव जैसे नारों को सरकारी उत्सव घोषित कर देती हैं। तमाम स्वनामधन्य आन्दोलनों और उनके कर्णधारों का यही हाल है। मुद्दों पर चुप रहो और परिणामों पर हवाबाजी करते रहो। पहाड़ के इन बड़े नामों ने पहाड़ का बहुत नुक़सान किया है।

2013 की केदारनाथ त्रासदी का ही उदाहरण ले लेते हैं। जब हम विकास परियोजनाओं के इस त्रासदी से सम्बन्ध की पड़ताल कर रहे थे और हमें पुख्ता प्रमाण मिल रहे थे कि बाँध परियोजनाओं ने इस त्रासदी की विराटता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ठीक उसी वक्त एक बहुत बड़े स्वनामधन्य पर्यावारणविद का प्रतिष्ठित विज्ञान शोध पत्रिका में लेख छपता है जिसमें वे उच्च हिमालय की घाटियों में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ लगाने की वकालत करते हैं। हम जानते हैं कि उच्च हिमालय की घाटियों में हिमोड़ अवादों के रूप में बेशुमार मलबा जमा है जो कभी भी इन परियोजनाओं को तबाह कर सकता है और साथ ही साथ नीचे के क्षेत्रों में तबाही ला सकता है। 2013 में लामबगड़ के ऊपर जे.पी. कंपनी के बाँध का यही हुआ था। इस तरह के व्यक्तित्वों के प्रभाव मात्र से छपे शोधपत्रों से जमीनी स्तर पर काम करने वालों को सच सामने लाने के लिए दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है। यदि कोई बड़ा मुद्दा जमीनी स्तर पर उठता भी है तो उसको उठाने वाले शीघ्र ही समारोहों और सेमिनारों के हीरो बनकर रह जाते हैं। वे इंडिया हैबिटैट सेंटर/इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के आलिशान सभाकक्षों में दहाड़ने लगते हैं और मूल मुद्दा कंदराओं में दम तोड़ देता है। हाँ, हमारे प्रदेश से एक और पर्यावरणविद को पद्म अलंकरण अवश्य मिल जाता है। यह सब बातें बहुत आहत करती है।

ज्ञानिमा : आप एक प्रतिष्ठित भूवैज्ञानिक हैं पर जब मैंने पहली बार आपको हिमालय के बारे में बात करते सुना तो लगा एक ऐसे ‘ऐक्टिविस्ट’ को सुन रहा हूँ जिसका हिमालय से बहुत जुड़ाव है। आपके व्यावसायिक कार्यकाल में पहाड़ों को लेकर आपकी व्यथा दिमाग से ज्यादा दिल को असर करने लगी? क्या कुछ लोग या घटनाएँ थी जिन्होंने आपको प्रभावित किया?

एक बात समझने की है कि भूविज्ञानी मैं अध्ययन से बना परन्तु हिमालयवासी तो मैं जन्म से हूँ। अतः हिमालय के सारे सरोकार मुझमें मेरे पालन-पोषण के दौरान ही विकसित होते गए। भूविज्ञान की समझ ने मेरे सरोकारों को तार्किक आधार दिए।

जन सामान्य के लिए हिमालय कुछ गढ़ी गयी अवधारणाओं पर फिक्स कर दिया गया है। आश्चर्य यह है कि इन निरपेक्ष अवधारणाओं में खुद हमारे लोग भी आकंठ डूबे हुए हैं। उदाहरण के लिए सब लोग कहते हैं कि हिमालय देव भूमि है। अब हम इस आत्ममुग्धता के गुब्बारे से फूले रहते हैं। असलियत यह है कि यहाँ मनुष्य भी रहते हैं जिनकी अपनी जरूरतें हैं, अपने सरोकार हैं। इस धरा से उनके भी जुड़ाव के मुद्दे हैं। जब हम देवभूमि जैसे ‘जार्गन’ का इस्तेमाल करते हैं तो हम खुद ही अपने मुद्दों से मुँह फेर कर आत्ममुग्धता की स्थिति में आ जाते हैं। यही कारण है कि सरकारें तो क्या देश के अन्य नागरिक भी, और यहाँ तक कि खुद हमारे अपने लोग, अपने मुद्दों को सम्पूर्णता में न तो समझने का प्रयास करते हैं और न ही ऐसी कोई आकांक्षा रखते हैं।

हिमालय के सरोकारों पर मैं बहुत भावुक हो जाता हूँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ। संभवतः इसकी शुरुवात श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी की प्रेरणा से हमारे द्वारा जे.पी. के विष्णुप्रयाग प्रोजेक्ट पर अध्ययन के दौरान हुई। वह मेरे जीवन का अहम मोड़ रहा। फिर उन्हीं के निर्देश पर 1970 की बिरही-बेलाकोची बाढ़ की त्रासदी के अध्ययन करते हुए उसकी भयावहता ने मुझे अन्दर तक हिला दिया। यहाँ से मैं हिमालय पर अधिक जिज्ञासा के साथ काम करने लगा। मैंने किसी खास समय में हिमालय की ओर रुख करने का निश्चय नहीं किया वरन यह गहरा जुड़ाव स्वतः होता चला गया।

यहाँ मैं यह भी जिक्र करना चाहूँगा कि 1983 में मुझे ‘काउन्सल फॉर सोशल जस्टिस’ नामक संस्था की तरफ से एक छोटा सा प्रोजेक्ट मिला था कि उत्तराखंड में युवाओं की गतिविधियों पर मैं एक रिपोर्ट तैयार करूँ। इस अध्ययन ने मेरी समझ को तराशने में बड़ी मदद की। एक ओर जहाँ चिपको आन्दोलन प्राथमिक तौर पर वन संपदा पर स्थानीय लोगों के हक-हकूकों को लेकर प्रारम्भ हुआ था, जो कि उत्तराखंड के गाँव-गाँव में अपना प्रभाव स्थापित कर चुका था, वहीं इस आन्दोलन से प्रभावित कुछ नवयुवक, जिनमें  स्व. शमशेर सिंह बिष्ट, स्व. गिर्दा, राजीव लोचन शाह, रमेश पहाड़ी, पी.सी. तिवारी, प्रदीप टम्टा आदि थे, से मेरी मुलाक़ात हुई। उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के बैनर तले इन नवयुवकों ने कस्बों-शहरों में आन्दोलन छेडा हुआ था। उनका नारा था ‘पेड़ न कटे तब तक, उद्योग न लगे जब तक’। इन नवयुवकों ने अपने आन्दोलन के दम पर जंगलों की नीलामी का विरोध किया और उसमें काफी हद तक सफल भी रहे। इस नारे और आन्दोलन ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये नारा सीधे तौर पर स्थानीय समुदायों के सरोकारों से जुड़ता था। हिमालय के सरोकारों से मेरे जुड़ाव का इन नवयुवकों से संपर्क होना एक महत्वपूर्ण कारण रहा।

आपने कहा कि लगभग एक दशक तक हिमालय के सरोकारों को लेकर मेरी सक्रियता कम अथवा बिलकुल नहीं रही। यह सच है क्योंकि मैं अहमदाबाद में अंतरिक्ष विज्ञान विभाग की एक प्रयोगशाला में कार्यरत था। उत्तराखंड से सम्पर्क उतना प्रगाढ़ नहीं रह पाया। फिर 1994 में उत्तराखंड राज्य आन्दोलन शुरू हुआ। गढ़वाल विश्वविद्यालय में एक भूविज्ञान का शोधछात्र एस. पी. सती, युवाओं के इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहा था। इस युवक में मैंने मुद्दों को समझने की काफी जिजीविषा देखी। यहाँ से एक टीम ने आकार लेना शुरू किया। बाद में मेरा संपर्क भूविज्ञान विभाग गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्राध्यापक प्रो. वाई.पी. सुन्द्रियाल से भी हुआ जो विज्ञान और जनसामान्य के सरोकारों के प्रति संवेदनशील अध्येता हैं। और हम फिर वरुणावत भूस्खलन से लेकर 1998 में घटित उखीमठ मध्यमहेश्वर घाटी की त्रासदी पर अपनी भूवैज्ञानिक समझ और हिमालय के सरोकारों से सम्बद्धता पर समग्र रूप से अध्ययन करने लगे। इसके बाद गाड़ी आगे बढ़ती गयी और आज जो कुछ भी है वो आपके सामने है।

ज्ञानिमा : जब कोई व्यक्ति किसी मुद्दे का संवेदनशीलता के साथ वैज्ञानिक विश्लेषण कर उसे गहराई ओर पूर्णता से समझने की कोशिश करता है, तब एक कार्यवाहीविहीन बहस का आह्वान, जिसमें महज बौद्धिक उत्तेजना होती है, एक बेईमानी सी प्रतीत होती है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? कुछ ऐसे अनुभव हैं जो आप साझा करना चाहेंगे?

कई बार पर ऐसा हुआ है कि मुद्दों से बहसों को भटकाने की कोशिशें हुई है। मुझे हिमालय की पर्यावरण सम्बंधित कुछ कमेटियों में काम करने का मौक़ा मिला। मैंने पाया कि कई लोग सिर्फ मुद्दे पर विमर्श को पटरी से उतारने की जुगत में लगे रहते हैं। 2013 की त्रासदी पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव के आंकलन हेतु गठित सुप्रीम कोर्ट की उच्चाधिकार कमेटी में भी यही हुआ और उसके बाद भी अन्य कमेटियों में ऐसा होता रहा है। ये बातें मुझे अंदर तक झकझोर देती हैं।

ज्ञानिमा : आपके पत्र में गहरा शोक है। पर शायद आप भी इन बातों को छोड़कर आगे बढ़ना चाहेंगे। आपके अनुसार व्यक्तियों और नागरिक समाज का कैसा आचरण एक निर्णायक बदलाव की नींव रख सकता है?

मेरा मानना है कि जनसामान्य की यह मान्यता बदलनी चाहिए कि कोई विराट व्यक्तित्व आयेगा और उनके मुद्दे पर जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय करवा देगा। हमारा पर्यावरणीय इतिहास बड़ी सफलताओं के बाबजूद बार-बार हमारे मुद्दों पर बड़े व्यक्तित्वों द्वारा अपने हितों के अनुरूप समझौते की उदास कहानियाँ हैं। अतः अब जनसामान्य को खुद सामूहिक रूप से खड़ा होना होगा। खतरे बढ़ रहे हैं अतः नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) को भी और सजग होना होगा।

अब परीस्थितियाँ बदल चुकी हैं। हिमालय पर खतरे पहले से अधिक बढ़ रहे हैं। सत्ता और कॉर्पोरेट का गठजोड़ पहले से अधिक तैयारी के साथ आता है। सिविल सोसाइटी के पास हिमालय के हर मुद्दे पर पुख्ता वैज्ञानिक तर्क होना चाहिए। मैंने पाया है कि वैज्ञानिक अध्ययन आधारित तर्कों पर ये सभी आक्रान्ता पीछे हटने पर मजबूर हो जाते हैं अतः सिविल सोसाइटी को इस दिशा में सोचना होगा।

ज्ञानिमा : क्या आप राजनेताओं और नौकरशाहों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?

मैं उन सब से यह कहना चाहता हूँ की हिमालय का मुद्दा क्षेत्रीय न होकर राष्ट्रीय, और यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय महत्त्व का होता है। आप और हम आज हैं पर कल नहीं रहेंगे। परन्तु कहीं ऐसा न हो कि हमारे आज के निर्णय अथवा हमारे वर्तमान क्रियाकलाप कल के लिए बड़े नासूर साबित हो जाएँ। अतः हिमालय के मुद्दों पर संवेदनशीलता की बहुत दरकार है।

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5 Comments on “मनुष्य भी रहते हैं इस देवभूमि में”

  1. निस्संदेह, यह मेरे लिए पृथ्वी विज्ञान के एक छात्र के रूप में एक उत्तेजक उत्तेजक अवलोकन है, लेकिन सामूहिक सामूहिक स्तर की कार्रवाई केवल क्षेत्र स्तर पर मुद्दों को हल कर सकती है, जिसके लिए एक टीम पूरी तरह से अभाव है

  2. Author has very aptly and lucidly presented the real scenario of the devastation in Himalaya and grubby politics associated with it.

  3. Hats off to the author. I am also from uttarakhand and am proud of its history and cultural legacy. However, in the given scenario devbhumi appeares to be a misnomer. It has become a land of sharks now.

  4. डॉक्टर नवीन जुयाल साहब, मैं ये जानना चाहता हूँ कि उत्तराखण्ड में शोध या अध्ययन प्राकृतिक आपदा के बाद ही क्यों किये जाते हैं। विशेषज्ञों द्वारा परियोजनाओं से सम्भावित समाघात और दुष्प्रभाव के साथ साथ समुचित प्रबंधन के विकल्प भी सुझाये जायें, जिन पर अमल कर सतत विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। आखिर देवभूमि के मनुष्य की अपनी जरूरतें भी तो होती है, जो उसने हिमालय से ही प्राप्त करनी है। हमारे राज्य में जल विद्युत के संसाधनों और पर्यटन की संभावनाओं के अलावा है ही क्या? जिससे हम आर्थिक रूप से मजबूत और आत्म निर्भर बन सकें। बिजली भी अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। चारधाम और बिजली परियोजनाओं में यदि केन्द्र सरकार नियोजन और निवेश कर रही है तो राज्य को रॉयल्टी और अवस्थापना सुविधायें मिलेंगी। हमारे पास तो परियोजनाओं के लिए पर्याप्त धन नहीं है। बिजली की कमी को पूरा करने के लिए हमें हिमांचल, दिल्ली और केंद्रीय पूल से खरीदनी पड़ती है, जो हमसे बेहतर स्थिति में हैं। आखिर उन्होंने भी तो परियोजनायें बनाई होंगी, मंत्रालयों, मौजूदा कानूनों और अधिकरणों द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा किया होगा, तभी स्वीकृति मिली होगी। आप मानते हैं कि हिमालय का मुद्दा क्षेत्रीय नहीं वरन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय है तो हम दूसरे देशों के सफल मॉडल का अध्ययन क्यों नहीं करते? उदाहरणार्थ चीन में 1949 तक 22 बाँध थे, कम्युनिस्ट सरकार के वर्चस्व के बाद आज 86000 से ज्यादा बाँध है। किस दर से बने होंगे अंदाजा लगाया जा सकता है। हमारे राज्य में उत्तराखंड राज्य के सृजन के उपरान्त 1000 मेगावाट की टेहरी , 280 मेगावाट की धौलीगंगा जो क्रमशः टीएचडीसी और एनएचपीसी द्वारा पहले से बनाई जा रही थी और हमारी सरकार ने 304 मेगावाट का मनेरी भली द्वितीय, कुल तीन परियोजना बनीं। नो प्रोजेक्ट जोन और इको सेंसटिव जोन की वजह से भागीरथी और अन्य स्थानों में राज्य और केन्द्र की कितनी परियोजनायें बन्द कर दी गईं, जिनमे दशकों से अनुसंधान और नियोजन का कार्य चल रहा था, अरबों रुपये का नुकसान तो हवा लेकिन देवभूमि के मनुष्य की आश भी जाती रही। सकारात्मक दृष्टिकोण से हिमालय को भी बचा पायेंगे और खुद को भी।

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