मैं कानूनी रूप से दोहरे दर्जे का नागरिक हूँ

सम्पूर्ण भारतवर्ष में जब कोई नागरिक संकट में होता है तो 100 डायल करता है। पर यह मूलभूत सुविधा मुझे उपलब्ध नहीं है। और मैं अकेला नहीं हूँ। उत्तराखंड के लगभग दो तिहाही लोग इस मूल अधिकार से पूर्ण रूप से वंचित है। और अदालतें भी इस अवैधता को स्वीकार करती हैं।

आपके लिए इस वास्तविकता को स्वीकार करना कठिन हो सकता है पर मेरे, और मेरे जैसे लोग के लिए, जो उत्तराखंड राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं, यह एक दुखदायी जमीनी हकीकत है। हमे मूलभूत पुलिस सुविधा उपलब्ध नहीं है क्योंकि उत्तराखंड राज्य का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा राजस्व पुलिस प्रणाली नामक एक प्राचीन ढांचे के तहत जीने के लिए मजबूर है।

इतिहास में झाँकें तो नागरिकों को मुख्य रूप से राजस्व के स्रोत के रूप में देखा जाता था। राजस्व के सुचारु संग्रहण के लिए राजस्व अधिकारियों को पुलिस व न्यायिक अधिकार दिए गए। जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत आई तो उसने भारत के अधिकांश हिस्सों में नियमित पुलिस व्यवस्था की स्थापना की पर उत्तराखंड जैसे कुछ इलाकों को छोड़ दिया। उनका कहना था की यहाँ अपराध दर कम है इसलिए पुलिस की जरूरत नहीं है। पर वास्तविकता शायद यह थी की जितना निवेश पुलिस व्यवस्था को लागू करने में लगता, राजस्व की संभावना उससे कम थी। अर्थात ‘निवेश’ में कोई ‘रिटर्न’, यानि मुनाफा, नहीं था।

आधुनिक भारत में, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर, पूरे देश को पुलिस व्यवस्था प्राप्त है। हमारे लिए राजस्व अधिकारी (पटवारी, तहसीलदार, आदि) ही पुलिस अधिकारी हैं। भारत का नागरिक होते हुए भी हमें इस विसंगति के कारण ‘विधि शासन’ (रूल ऑफ लॉ), अर्थात कानून के शासन, से वंचित रखा गया है। ‘विधि शासन’ हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है।

प्रस्तुत परिदृश्य इस विसंगति को साफ उजागर करते हैं –

  1. यदि कोई नागरिक संकट में है या किसी अन्य नागरिक को संकट में देखता है तो वह 100 या 112 पर फोन कर सकता है। ऐसे फोन कॉल रिकॉर्ड किए जाते हैं और पुलिस को निर्धारित समयसीमा में जवाबी कार्यवाही करनी होती है। यह सुविधा हमें उपलब्ध नहीं है। हमें पटवारी या उच्च राजस्व अधिकारियों को फोन करना होता है।
  2. चूंकि 100 जैसी कोई सामान्य फोन नम्बर निर्धारित नहीं है इसलिए शिकायत दर्ज करने के लिए संबंधित अधिकारी की फोन नम्बर जानना आवश्यक है। अगर नम्बर उपलब्ध है तब भी हम वक्त बेवक्त शिकायत दर्ज नहीं करा सकते।
  3. अगर पुलिस को किसी अपराध की जानकारी है, या मिल जाए, तब भी वह राजस्व क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यदि पुलिस किसी गाँव में घुस जाती है और किसी संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में ले लेती है तो उस पर अपहरण के आरोप लग सकते हैं।
  4. जहाँ पुलिस को हर मसले पर तुरंत कार्यवाही करनी होती है, पटवारी केवल जघन्य अपराधों के मामले में तत्काल प्रतिक्रिया करते हैं हालांकि उनका ‘तत्काल’ भी नियमित पुलिस प्रतिक्रिया के मुकाबले एक बेहद लंबा समय होता है।
  5. जब पटवारी अपराध स्थल पर जाता है तो वह अक्सर अकेला होता है, या एक होमगार्ड को साथ लिए हुए। सच पूछें तो यह तैयारी गुंडों के एक छोटे समूह को संभालने के लिए भी नाकाफी हैं।
  6. चूंकि राजस्व अधिकारियों को आधुनिक पुलिसिंग तकनीकों में प्रशिक्षित नहीं किया जाता है इसलिए उनकी जांच अक्सर ढीली व धीमी होती है जिसके कारण संदिग्धों की दोषमुक्ति दर बहुत अधिक है।
  7. पटवारी राजस्व रिकॉर्ड रखने के साथ साथ सरकारी योजनाओं को लागू करने की भी एक अहम कड़ी है जिसके कारण ग्रामीणजन उनसे अच्छे संबंध रखने की कोशिश करते है। उनके इस दबदबे के कारण लोग उनका विरोध करने से डरते हैं जिसके चलते ग्रामीण इलाकों में आपराधिक मामलों में भी तथाकथित ‘समझौता’ एक सामान्य बात हो चुकी है। इसी दबदबे के चलते भ्रष्टाचार की शिकायतें भी दर्ज नहीं होती हैं।

ये परिदृश्य साफ दर्शाते हैं कि जब मुनीम, कोतवाल और काजी एक ही व्यक्ति हो तो आम जनता कुछ भी करने में असमर्थ सी हो जाती है। यह व्यवस्था खराब होने के साथ-साथ नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन भी करती है। इसी कारण उत्तराखंड के उच्च न्यायालय ने भी स्वः प्रेरणा से इस औपनिवेशिक प्रथा को अवैध घोषित करते हुए इसे छह माह के भीतर समाप्त करने का आदेश पारित किया।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय का निर्णय

निम्नलिखित अंश जनवरी 12, 2018 को न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की पीठ द्वारा 2013 की आपराधिक अपील संख्या 100 (सुंदर लाल बनाम उत्तराखंड राज्य) के निर्णय से हैं। यह उस आदेश का हिन्दी अनुवाद है अतः इसे कानूनी दस्तावेज़ के रूप में प्रयाग ना करें।

  • न्यायालय के सामने ऐसे अनेक मामले आए हैं जिनमें राजस्व पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के बाद पटवारी मामले की जाँच करते हैं। जघन्य अपराधों के मामलों में जाँच नायब तहसीलदार द्वारा की जाती है। पटवारी द्वारा मामला दर्ज किए जाने और पटवारी या नायब तहसीलदार द्वारा जाँच किए जाने की यह व्यवस्था आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 और उत्तराखंड पुलिस अधिनियम, 2007 के प्रावधानों के खिलाफ है।
  • इस प्रणाली को ‘राजस्व पुलिस क्षेत्रों’ की ‘राजस्व पुलिस प्रणाली’ के रूप में जाना जाता है। जिस तरह उत्तराखंड राज्य के बहुत बड़े हिस्से में राजस्व पुलिस प्रणाली लागू है उससे जनित अवैज्ञानिक जाँच के परिणामस्वरूप न्याय व्यवस्था का हनन होता है।
  • यह राजस्व पुलिस प्रणाली शायद उस समय प्रासंगिक थी जब पहाड़ी क्षेत्रों में अपराध नगण्य था। समय के साथ उत्तराखंड राज्य के अपराध दर में वृद्धि हुई है जिसके लिए हम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) की रिपोर्ट उद्घृत कर सकते हैं।
  • पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारियों को गंभीर आपराधिक मामलों का जाँच अधिकारी बनने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता है।
  • राजस्व पुलिस को घटनास्थल, पूछताछ, कंप्यूटर, आवाज विश्लेषण, उंगलियों के निशान, उपकरण के निशान, आग्नेयास्त्र, दस्तावेज, जहर, नशीले पदार्थ, शराब, विस्फोटक वस्तुओं, आग, सूक्ष्म अवशेष, बाल, शरीर के तरल पदार्थ, डीएनए प्रॉफिलिंग, आत्महत्या, दुर्घटना, हत्या, मृतकों की पहचान, कंकाल अवशेष, यौन अपराध, इत्यादि के प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता है। इस तरह के क्रियाकलापों को वैज्ञानिक तरीकों से एक प्रशिक्षित पुलिस ही कर सकती है।
  • राजस्व अधिकारी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी), साक्ष्य अधिनियम और आपराधिक कानून को नियंत्रित करने वाले अन्य सहायक कानूनों से परिचित नहीं हैं। उनकी योग्यता केवल मैट्रिकुलेशन है।
  • राजस्व अधिकारियों द्वारा किए गए ढुलमुल जाँच के कारण अभियुक्त बरी हो जाते हैं।
  • पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों को नियमित पुलिस द्वारा सुरक्षा और सेवा दिए जाने की आवश्यकता है।
  • अपराध पता लगाने और नागरिक संरक्षण के मामले में राजस्व पुलिस की स्तिथि दयनीय है।
  • यह एक असाधारण सी स्थिति है कि एक ओर उत्तराखंड राज्य के चार जिलों में नवीनतम तकनीकों द्वारा नियमित पुलिस आपराधिक जाँच करती है जबकि अन्य जिलों में राजस्व पुलिस आज भी अपने ढुलमुल तरीकों के जाँच आगे बढ़ाती है।
  • जीवन जीने के मौलिक अधिकार, वैज्ञानिक जाँच और तात्कालिक सुनवाई के परिपेक्ष में देखें तो पहाड़ी जिलों में रहने वाले सभी लोगों के साथ, चार जिलों के मुकाबले, भेदभाव करने के पीछे कोई बुद्धिमत्तापूर्ण तर्क नहीं है।
  • ‘विधि शासन’ (रूल ऑफ लॉ) कायम रखने के लिए जरूरी है की अपराध का जल्द से जल्द पता लगे और दोषियों को शीघ्रातिशीघ्र सजा मिले। बिना किसी औचित्य के राज्य को दो भागों में विभाजित करना विधि शासन के प्रावधानों के खिलाफ है। विधि शासन अर्थात कानून का शासन भारतीय संविधान की एक मूलभूत विशेषता है।
  • विधिवत प्रशिक्षित पुलिस कर्मियों द्वारा अपराध की वैज्ञानिक जाँच ‘राइट टू लाइफ’ अर्थात जीवन जीने के मौलिक अधिकार में निहित है।

उपर्युक्त अवलोकन करने के बाद, माननीय न्यायालय ने निम्नलिखित आदेश पारित किया (अग्रेज़ी आदेश का हिन्दी अनुवाद) –

  • फैसले सुनाने के पहले यह आदेश दिया जाता है की उत्तराखंड राज्य के कई हिस्सों में लागू, एक शताब्दी से भी अधिक पुरानी, राजस्व पुलिस प्रणाली को आज से छह महीने के भीतर समाप्त किया जाए। इस बीच राज्य सरकार, पूरे देश में प्रचलित नियमित पुलिस प्रणाली को उत्तराखंड के सभी जिलों में लागू करे।
  • राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है की आज से छह महीने के भीतर, सी.आर.पी.सी. की धारा 2 (एस) और उत्तराखंड पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 7 के अनुसार, पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस स्टेशन खोले।
  • समस्त उत्तराखंड राज्य में, छह महीने के भीतर, प्राथमिकी (एफ.आई.आर) पंजीकरण, जांच और चालान आदि केवल नियमित पुलिस द्वारा किया जाए, पटवारियों द्वारा नहीं। इस आदेश का अनुपालन सी.आर.पी.सी. के प्रावधानों के अनुसार कड़ाई से हो।

इस आदेश को पारित हुए ढाई साल से अधिक समय बीत चुका है पर हम आज भी उसी पुरातन व्यवस्था के तहत जीते के लिए मजबूर हैं, उत्तराखंड के उच्च न्यायालय के साफ और सख्त आदेश के बावजूद।

पूरे फैसले को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

अदालत की अवमानना

उक्त आदेश के बाद, उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। मामला जस्टिस एन.वी. रमन्ना और जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर की पीठ के सन्मुख है।

मुझे पूरी उम्मीद थी कि इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय राज्य सरकार को कोई राहत नहीं देगी क्योंकि इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय पहले ही प्रतिकूल टिप्पणी दे चुकी है। न्यायमूर्ति वी.एस. सिरपुरकर और न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक की पीठ ने सितंबर 16, 2010 को 2005 की आपराधिक अपील संख्या 1164 (सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल राज्य) में निम्नलिखित टिप्पणी की थी–

वह समय आ चुका है जब उत्तरांचल के सुदूर क्षेत्रों में प्रचलित ग्रामीण पुलिस प्रणाली को बदलना होगा और इन सुदूर अञ्चल के ग्रामीणों को नियमित पुलिस की सुरक्षा और सेवाएं उपलब्ध करानी होंगी। यह एक विचित्र स्तिथि है कि उत्तराखंड के मैदानी इलाकों के चार जिलों को सामान्य पुलिस सेवाओं का लाभ मिल रहा है जबकि शेष जिलों को इस व्यवस्था से वंचित रखा गया है। स्वाभाविक है की इस तरह के वंचन से कानून व्यवस्था की स्थिति, अपराधों का पता लगाने की क्षमता और गरीब ग्रामीणों की सुरक्षा प्रभावित होती है। प्रभावी पुलिस प्रणाली पूरे समाज की जरूरत है, शहरी तथा ग्रामीण।

क्योंकि मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में है और राज्य सरकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश को लागू नहीं किया है इसलिए ऐसा लग रहा था की इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कुछ राहत दी होगी। पर जब मामले की तहकीकात की तो यह जानकर अत्याधिक आश्चर्य हुआ लगा कि उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को किसी तरह की कोई राहत नहीं दी है। इसका साफ अर्थ यह है कि आज की तिथि में माननीय उच्च न्यायालय का आदेश मान्य है। न्यायालय का वह आदेश एक लागू कानून के तुल्य है अतः उत्तराखंड सरकार द्वारा आदेश का अनुपालन न करना साफ तौर पर अदालत की अवमानना है। अदालत का आदेश न मान कर राज्य सरकार कानून का उल्लंघन तो कर ही रही है, वो साथ ही साथ राज्य के नागरिकों को विधि शासन के प्रावधानों तथा उनके जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकारों से भी वंचित रख रही है।

एक आधुनिक लोकतंत्र में इससे बदतर और क्या हो सकता है?

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