क्या ऑनलाइन शिक्षा का दौर आ चुका है?

कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जहाँ चाह वहाँ राह। अपनी इस चाहत के चलते मनुष्य ने आजतक अपने मूलभूत अनुभवों से उपजी समझ को ज्ञान के नए-नए रूपों का आकार दिया और धीरे-धीरे उसे परिमार्जित और संश्लेषित कर प्रस्तुत किया है। इंसानी समझ की इसी ताकत ने 21वीं सदी तक आते-आते पारंपरिक तरीकों से सीखने की विधा को नए आयाम दे डाले।

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क्या आप शिक्षा की पैमाइश कर सकते हैं?

प्रो. पीटर ग्रे का एक सवाल है – “क्या आप जीवन के अर्थ को परिभाषित कर सकते हैं?” उनका कहना है की, “वक़्त आ गया है कि क़दम वापस खींचें और शिक्षा के उद्देश्य पर गंभीरता से विचार करें।“ इस लेख में प्रो. पीटर ग्रे ने शिक्षा के माप-जोख से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।

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उत्तराखंड के सपने और यथार्थ

9 नवंबर 2000 को पृथक राज्य के रूप में उत्तराखंड अस्थित्व में आया। ऐसा लगता है की पिछले दो दशकों में विकास की गति के साथ-साथ सामाजिक चेतना की लौ भी धीमी पड़ गई है। बोये गए सपने जिस तरह बिखरते चले गए हैं उसने न केवल सामाजिक उत्साहहीनता की स्थिति ला खड़ी की है बल्कि लागू किये जा रहे आधुनिक विकास माडल पर भी सवालिया निशान लगा दिये है।

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अनुभव से सीखना

खुद करके सीखने की प्रक्रिया में सफलता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण असफलता होती है जो सीखने वाले को समझ की गहराइयों में ले जाती है। हमारी परम्परागत शिक्षा व्यवस्था असफलता को अच्छी नज़र से नहीं देखती और दंडनीय समझती है। यह बात यूं तो हर विषय पर लागू होती हैं लेकिन प्रस्तुत लेख खासकर विज्ञान शिक्षा के सन्दर्भ में है।

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