उत्तराखंड की अवधारणा

उत्तराखंड राज्य की कल्पना एक स्वप्न था जिसमें जमीन, जल, जंगल और जन अग्रसर थे एक स्थायी सुखद भविष्य की ओर। वह एक ऐसी सामाजिक और भौगोलिक कल्पना थी जिसमें यहाँ के निवासियों के लिए सम्मान था, आजीविका के साधन थे और आधुनिक सुख सुविधाएँ थी – एक ऐसी कल्पना जिसके क्रियान्वयन  की कीमत जमीन, जल या जंगल को न चुकानी पड़े।

9 नवंबर 2000 को वह स्वप्न साकार हो गया। एक पृथक राज्य के रूप में उत्तराखंड अब बीस बरस का हो चुका है। ऐसे में उत्तराखंड राज्य की विकास यात्रा का मूल्यांकन करना जरूरी है। पर वह करने से साथ-साथ यह भी जरूरी है की हम इसकी सामाजिक संरचना और उन सामाजिक-ऐतिहासिक कारकों की चर्चा करें जिसने राज्य के रूप में उत्तराखंड की अवधारणा (आइडिया ऑफ़ उत्तराखंड) की निर्मिति की।

दरअसल उत्तराखंड का सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचा लंबे समय से पोषित ऐसी सांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसे औपनिवेशिक व्यवस्था ने और अधिक निष्ठुर व जटिल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्चस्व कायम करने की होड़ में आरंभिक पशुचारक-कृषक समाज का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे दो तबकों में विभाजित होता चला गया। समाज के प्रभावशाली तबके पारंपरिक सहजीवन आधारित जीवनशैली को छोड़कर श्रम में हाथ बंटाए बिना संपत्ति अर्जित करने लगे। मध्ययुग से अस्तित्व में आए अभिजन (इलीट) द्वारा विकसित यह सामाजिक परजीविता (सोशिअल पैरासीटिज्म) का एक ऐसा संसार था, जिसमें इन परजीवी तबकों ने श्रमशील समुदायों पर सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता और राजनैतिक वर्चस्व का ताना-बाना बुनना शुरू किया। फलस्वरूप एक सामाजिक सोपानक्रम (सोशिअल हाईरार्की) विकसित हुआ जो संभवतः अखिल भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति आकर्षण से पैदा हुआ था। इस नए विचार से मुग्ध और उसके प्रति अत्यधिक संवेदनशील इस वर्ग ने बहुत जल्दी जातीय शुद्धता, खानपान और पेशों से जुड़ी श्रेष्ठता जैसे मानक तैयार कर लिए। बदलाव की यह प्रक्रिया स्थानीय समाज को सांकेतिक रूप से ‘सभ्य’ बनाने कि ऐसी कवायद थी जिसने उसे उच्च और निम्न श्रेणी में विभाजित कर डाला। सांस्कृतिक रूपांतरण का यह चक्र तब तक चलता रहा जब तक कमजोर तबके अपनी जीवन शैली को असभ्य और पिछड़ा मानकर पूरी तरह हाशिये में नहीं चले गए।

उत्तराखंड में यह एक ऐसा बदलाव था जिसने समाज में अलगाव के साथ-साथ गैर-बराबरी की मानसकिता को तेजी से आगे बढ़ाया। मध्यकाल में क्षेत्रीय राजनैतिक सत्ता के केन्द्र के रूप में विकसित हुए नगरों में रहने वाली आबादी को ‘भ्यार गों’, और ‘भितेर गों’ सरीखे संबोधन से अभिजात्य कस्बाई और निपट ग्रामीण समाजों में बाँटना तथा शोषित व जनजातीय तबकों को हिकारत भरी नजर से देखना इस छद्म श्रेष्ठता और अलगाव के साफ़ संकेत थे।

औपनिवेशिक दौर में राज्य ने परंपरागत प्रभावशाली वर्गों को धीरे-धीरे प्रशासन में भागीदारी की नीति से दूर हटाते हुए अपने अनुकूल नये विशिष्ठ वर्ग को विकसित करना आरम्भ किया। दरसअल वे ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की तलाश में थे जो परंपरागत भूमिधर अभिजात्य न हो और आधुनिक बदलाओं को श्रेष्ठ व उच्च समझते हुए उसका पैरोकार बने। दरसल औपनिवेशिक शिक्षा, साक्षरता और आधुनिकता के आकर्षण से पैदा हुई लामबंदी ने उतराखंड में एक ऐसे प्रबुद्ध वर्ग को जन्म दिया जो अपनी मानसिकता, समझ और कार्य व्यवहार में वर्गीय श्रेष्ठता की चेतना से ओतप्रोत था।

सत्ता के आकर्षण और राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में उपजी राजनैतिक चेतना ने उत्तराखंड के अभिजात्य वर्ग को सत्ता पाने का सपना दिखाया। अब से कोई 93 साल पहले सन 1927 में साइमन कमीशन के भारत दौरे के वक्त पहली बार कस्बाई समाज के एक हिस्से ने अपने अन्दर दबी इस इच्छा को सामूहिक आवाज देने की कोशिश की थी। यह उल्लेखनीय है कि समाज में व्याप्त असमानता और अलोकतान्त्रिक मूल्यों के विरुद्ध एक बेहतर लोकतांत्रिक नागरिक समाज के निर्माण हेतु विमर्श को पैदा करने के बजाय यह वर्ग प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार और अपनी संस्कृति सरीखे मुद्दों को सामाजिक विमर्श के केंद्र में ले आया। अलग कुमाऊँ प्रांत के औचित्य को सही ठहराते हुए इस वर्ग ने एक ज्ञापन तैयार किया था जिसे वह साइमन कमीशन के सौंपना चाहता था। एक अलग राज्य निर्माण को लेकर उसका यह नजरिया अंत तक कायम रहा। यही कारण रहा कि वर्गीय चेतना के प्रभाव में ‘आरक्षण’ जैसी चिंगारी पृथक राज्य आन्दोलन को भड़काने में कारगर रही। एक बार फिर समता पर आधारित कल्याणकारी राज्य जैसे मूल्यों की बहस आंदोलन में सिरे से गायब हो गई और वर्चस्व स्थापित करने के लिए परंपरागत रूप से अपनायी जाने वाली रणनीतियां यथावत बनी रहीं। अलोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित इन दृष्टि संकीर्णताओं ने राज्य के एक ऐसे ‘विचार’ को उभारा जो पूरी तरह सामाजिक परजीविता को बढ़ावा देने वाला था।

यह उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक शासन के जिस ढांचे को उखाड़ फ़ैकने के लिए आम लोग एक जुट हुए थे, दुर्भाग्यवश आजाद भारत के अभिजन द्वारा न केवल उस ढांचे को बल्कि उन नीतियों को भी जस का तस बनाए रखा गया। ऐसा लगता है कि आर्थिक प्रयोगों को लेकर आजादी मिलने के बाद राजनैतिक वर्ग के एक हिस्से ने शुरुवाती सालों में पारंपरिक भारतीय नैतिक मूल्यों को नए सन्दर्भों में परिभाषित करने और आर्थिक नीतियों में शामिल किये जाने की कोशिशें कीं। उसकी अपनी समझ थी कि ऐसे मूल्य विकास अवधारणाओं और सामाजिक परिवर्तन खासकर हाशिये में खड़े आदमी को लेकर समाज को नई ऊर्जा और आर्थिक प्रयोगों को स्थायित्व देंगे, लेकिन सत्तर के दशक के आते आते यह धारणा भी टूटती चली गई। नए आर्थिक युग की शुरुवात के साथ ही आर्थिक सुधारों के कार्यक्रमों ने नए सूरत-ए-हाल पैदा कर दिए। आर्थिक स्वतंत्रता के नाम पर राजनीति द्वारा पुराने वादों से एकदम किनारा कर समाज को अचानक मुक्त बाजार के हवाले कर दिया गया।

यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसने नए उभर रहे मध्यवर्ग की ‘उपभोग’ की भूख को लगातार अनियंत्रित किया। बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने लालच और लूट के लिए दरवाजे पूरी तरह खोल दिये। नव-उदारवादी आर्थिक माडल ने उत्तराखंड के गाँव से लेकर शहरों तक में छद्म सम्पन्नता भरी ऐसी नवधनाड्य मध्यवर्गीय संस्कृति का निर्माण किया जो अपने आसपास लगातार बढ़ रही गरीब, वंचित और सामाजिक असमानता से जूझ रही आबादी के हालात को अनदेखा करने लगी थी। इस संस्कृति से मुग्ध यह नया वर्ग आर्थिक दर्शन और नीतियों का न केवल प्रशंसक था, बल्कि उसके पक्ष में पूरी मजबूती से खड़ा होता गया। इसने स्वभावतः अन्त्योदय की पुरानी अवधारणा को एकदम उलट डाला।

दरअसल आजादी के बाद से ही प्रभावशाली वर्गों के लिए मुनाफे पर आधारित तंत्र और विकास योजनाओं का सिलसिला शुरू हुआ। इन बदलावों ने आजादी मिलने के साथ बेहतरी की आस लगाए उत्तराखंड वासियों के सपनों को जल्दी ही बिखेरना शुरू कर दिया। स्थानीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लचर विमर्श से उभरा तबका व्यक्तिगत मुनाफे की संस्कृति का शिकार होता चला गया। यही कारण था कि स्वतन्त्रता के महज दस वर्षों के भीतर ही समाज की बेचैनी एक बार फिर उभरने लगी। इस नई शासन संस्कृति के विरोध की शुरुआत साठ के दशक में नशीले पदार्थों खासकर शराब से राजस्व कमाने के प्रश्न को लेकर हुई। देहरादून में सर्वोदयी कार्यकर्ता सोहन लाल भूभिक्षु द्वारा शराब के खिलाफ असंगठित विरोध से शुरू हुआ यह क्रम दशक के अंत तक संगठित आन्दोलन का रूप ले चुका था। अभी यह प्रश्न सुलझा न था कि सत्तर के दशक में जंगलों में अधिकार को लेकर सत्ता और समाज आमने सामने आ गए और चिपको के रूप में एक नया आंदोलन उठ खड़ा हुआ जो लगातार प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय समाज के अधिकारों की मांग करता रहा। अस्सी के दशक में एक बार फिर नशीले पदार्थों का कारोबार और उससे उपज रहे सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव सामाजिक असंतोष और आंदोलन का कारण बने। देखा जाय तो जो सामाजिक असंतोष और मुद्दे अंग्रेजों के विरोध का कारण बने आजादी के बाद बिना समाधान ढूँढे ऐसे मसले लगातार हाशिये में डाले जाते रहे।

यही सब मसले अंततः पृथक राज्य की माँग का ईधन बने। सामाजिक समता, स्थायित्व व सुखद भविष्य की कल्पना ने एक बार फिर, समाधान के रूप में, उत्तराखंड की एक पृथक राज्य के रूप में कल्पना की। यह कल्पना इन बीस सालों में कितनी साकार हुई यह आज भी यक्ष प्रश्न है। एक ऐसा प्रश्न जो अक्सर राजनैतिक वाद विवाद के दंगल में धूल चाटता हुआ मिल जाता है। पर उम्मीद पर दुनिया कायम है और हम आस लगाये बैठे हैं!


9 नवंबर 2000 को पृथक राज्य के रूप में उत्तराखंड अस्थित्व में आया। ऐसा लगता है की पिछले दो दशकों में विकास की गति के साथ-साथ सामाजिक चेतना की लौ भी धीमी पड़ गई है। बोये गए सपने जिस तरह बिखरते चले गए हैं उसने न केवल सामाजिक उत्साहहीनता की स्थिति ला खड़ी की है बल्कि लागू किये जा रहे आधुनिक विकास माडल पर भी सवालिया निशान लगा दिये है। उत्तराखंड के सपने और यथार्थ पर डॉ गिरिजा पांडे का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

गिरिजा पांडे
यह लेख शेयर करें -

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *