उत्तराखंड की कर्मठ महिलाएँ – 1

वैसे तो पूरे विश्व की महिलाएँ काफ़ी कामकाज़ी रही हैं पर पर्वतीय महिलाओं की ज़िन्दगी उनसे कुछ ज़्यादा ही काम करवाती आयीं है। कठिन भूगोल के कारण पर्वतीय महिलाओं को साधारण कार्य में भी पूरी क़मर तोड़ परिश्रम की आवकश्यता पड़ती है। एक आम पर्वतीय महिला की दिनचर्या सुबह तड़के चार से पाँच बजे शुरू हो जाती है। वह घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और रात में सबके सोने के बाद सोती हैं।

सुबह उठकर पशुओं को चारा-पानी देना, घर के लिए पीने के पानी का प्रबंध करना, भोजन बनाना, चौका-बर्तन निपटना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, जंगल से चारा या लकड़ी लाना, खेतों में काम करना, बच्चों के स्कूल से आने के बाद उन्हें नाश्ता करवाना, फिर खेतों में काम करना, पशुओं को चारा-पानी देना, रात का भोजन बनाकर परिवार को खिलाना, फिर चौका-बर्तन निपटना… यह क्रम हर दिन, लगातार, चलता रहता है। यह कार्य, जिसे महिलायें सदियों करती आयी हैं, यदि सकल घरेलू उत्पाद में आँका जाये तो उसका अनुपात अत्यधिक चौंकाने वाला होगा। इतना कार्य करने पर भी महिलाओं को निरंतर पैसों का अभाव रहता है और परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यह फोटो फ़ीचर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाली उत्तराखंड की कर्मठ महिलाओं के अभिन्न योगदान पर केन्द्रित है। पिछले दो दशकों के दौरान उत्तराखंड के अंतर्वर्ती इलाकों में घूमते हुए फिल्म और डिजिटल कैमरे से लिए गए ये चित्र उसकी रोज़मर्रा की जिंदगी को बयान करते हैं।

सूखे मक्कों से दाने निकालती यह महिलायें जौनसार-बाबर क्षेत्र की हैं जहाँ मक्का की काफी अच्छी पैदावार होती है। फसल काटने के बाद मक्के को घरों के बाहर सूखने के लिए लटका कर रख दिया जाता है। यहाँ से गुजरने पर लगभग सभी घरों में लटकी मक्के की सुनहरी मालायें देखने को मिल जायेंगी। (डिजिटल फ़ोटो)

भिकियासैंण के पास लिए गए इस चित्र में एक महिला और पुरुष बैलों द्वारा धान मढ़ाई कर रहे हैं। उत्तराखंड में धान से चावल निकालने की परंपरागत विधि को मढ़ाई कहते हैं। यहाँ धान मढ़ाई कई तरीकों से की जाती है उनमें से एक तरीका है बैलों द्वारा धान मढ़ाई किया जाना जिसमें धान के ऊपर बैलों को चलाया जाता है। (स्लाइड फ़िल्म)

परिवार में लड़कियों को छोटी उम्र से ही कामकाज में प्रशिक्षित दिया जाने लगता है। यह दायित्व भी महिला का है। महिला ने दो टोकरियां (एक बड़ी और एक छोटी) लटका रखी हैं जिनमें कृषि उत्पाद हैं। मण्डल (गोपेश्वर) में खींचे गए इस चित्र में एक महिला के साथ उसकी बेटी जीवन के इस संघर्ष को देख रही है। (स्लाइड फ़िल्म)

लैंसडौन के पास एक गाँव में देर शाम एक वृद्ध महिला तन्मयता से गेहूँ साफ़ करती हुई अपने में खोई है। (स्लाइड फ़िल्म)

धान की लहलहाती फ़सल के बीच कमरतोड़ श्रम का फल ख़ुशी का एहसास कराता है। इस महिला के चेहरे की खुशी यही इजहार करती है। (स्लाइड फ़िल्म)

दोपहर के भोजन कार्य को निपटाने के बाद खेती के लिए जाती एक महिला गरुड़ घाटी की है। पास में नदी होने के कारण यहाँ सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है। उत्तराखंड में बहुत कम इलाकों में ही पानी की ऐसी सुलभता है। यहाँ के अधिकांश गावों में खेती के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है की खेती कष्टपूर्ण है और इस कारण महिलाओं को खेती के लिए अधिक श्रम और समय व्यय करना पड़ता है। (डिजिटल फ़ोटो)

बुआखाल से दुगड्डा आते हुए रास्ते में यह मंज़र देखने को मिला। देर शाम का वक़्त था और यह बुजुर्ग महिला अपने खेतों में फसल कटाई के बाद बचे ठूंठों को जलाकर नयीं फसल के लिए तैयार कर रही थी। (स्लाइड फ़िल्म)

लोहाघाट और आसपास के इलाक़े में एक महिला बड़ी तल्लीनता से अपने खेत में काम करते हे देखि जा सकती है। अपने मैन्युअल कैमरे के साथ मैंने रास्ता बदला और इनके खेत की ओर रुख किया। बिना इन्हें खबर किए दो-तीन चित्र खींचे और वापस आ गया। (स्लाइड फ़िल्म)

दिन के क़रीब दो बजे होंगे। हम भतरौंजखान के आसपास से गुजर रहे थे जब देखा की एक बुजुर्ग महिला चिलचिलाती धूप में अपनी छत पर मिर्च सूखा रही थी। उनके साथ कुछ बच्चे भी थे। गाड़ी रोककर मैं कुछ देर वहाँ बैठा और इनसे कुछ बातचीत भी की। फेसबुक पोस्ट में इस चित्र को देख कर आमा के पोते ने न केवल संपर्क किया बल्कि अपने गाँव आने का न्योता भी दिया। (स्लाइड फ़िल्म)

(बाएँ) गढ़वाल का एक गाँव, जिसका नाम मैं भूल सा गया हूँ, के घर के आँगन में हम चाय पीने रुके हुए थे और मैंने देखा एक महिला कोने में सुपे से अनाज साफ़ कर रही हैं। उनसे बातचीत के दौरान मुझे यह चित्र खींचने का मौका मिला। (स्लाइड फ़िल्म)

(दाएँ) बेरीनाग के पास स्थित एक बहुत सुन्दर गाँव है जिसका नाम है बाफिला गाँव। भरी दोपहरी में एक लड़की अपने चौलाई (रामदाना) जिसे स्थानीय बोली में चुआ कहते हैं, के खेत में काम कर रही थी। पीछे पंचाचूली के शिखर इस सुन्दर छटा में चार चाँद लगा रहे थे।  (स्लाइड फ़िल्म)

यह चित्र चकराता क्षेत्र का है। कुछ महिलायें अपने खेतों में तन्मयता से काम करती हुई मिलीं। झुककर काम करती महिलाओं की पीठ और क़मर बिलकुल सीधी है जो इनके जी तोड़ परिश्रम का प्रमाण है। (डिजिटल फ़ोटो)

संजय नैनवाल
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