उत्तराखंड की कर्मठ महिलाएँ – 2

कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, कृषि के लिए अपर्याप्त भूमि, सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भरता, दुधारू पशुओं से कम उत्पाद, तथा जल, जंगल, और ज़मीन के निरंतर ह्रास ने  पर्वतीय महिलाओं की ज़िन्दगी को बहुत व्यस्त और कष्टपूर्ण बनाया है । ऐसी न जाने कितनी और दुश्वारियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था में स्त्री के स्थान ने उनके जीवन को कड़े श्रमसाध्य और कष्टपूर्ण बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

जितना श्रम यह महिलायें करती आईं हैं, या करती रही हैं, उतना श्रम शायद ही कोई अन्य करता होगा। अगर इनके श्रम को जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) के संदर्भ में आँका जाए तो शायद आँकलन काफी चौकाने वाला होगा। यह विडंबना ही तो है की इतने श्रम के बावजूद इन महिलाओं को पैसों का निरंतर अभाव रहता है और संकट के समय इन्हें रिश्तेदारों व दोस्तों पर निर्भर रहना पड़ता है।

यह फोटो फ़ीचर इस कड़ी का दूसरा भाग है जो इन जुझारू और कर्मठ महिलाओं की दिनचर्या को दर्शाता है। आशा है इन चित्रों की सुंदरता में निहित जटिलता और छुपे हुए जीवन संघर्ष को भाँपते हुए आप ये भी जरूर सोचेंगे की यह कैसी विचित्र व्यवस्था बना दी है हमने।

बाँसुलिसेरा ग्राम मे धान के खेत में काम करती महिलाएँ। (डिजिटल फोटो)

चोपता से तुंगनाथ जाते समय बारिश पढ़ रही थी तथा घना कोहरा छाया हुआ था। रास्ते में कुछ मिनट सुस्ताने के दौरान हमने देखा की कोहरा छँटना शुरू हो गया तथा मुझे अपने पास एक चट्टान सी दिखाई देने लगी। गौर से देखा तो एक उम्रदराज़ महिला हाथ में दराती और रस्सी लिए अपने पशुओं को ढूढ़ती नज़र आयी। (स्लाइड फिल्म)

उत्तराखंडी महिलाएँ अपनी कर्मठता के लिए विख्यात हैं। जखोली ग्राम के करीब खेतों में खाद ले जाती हुई कुछ महिलाएँ। (स्लाइड फिल्म)

यह फ़ोटो जौनसार भाबर क्षेत्र की है। इस क्षेत्र में मक्का की पैदावार काफी अच्छी होती है। फसल काटने के बाद मक्के को यहाँ के घरों के बाहर सूखने के लिए लटका कर रखते हैं।  लगभग सभी घरों में आपको मक्के की सुनहरी मालायें देखने को मिलती हैं। इस छायाचित्र में अपनी पारम्परिक वेशभूषा में एक जौनसारी अपने घर के बाहर बैठी हुई है। (स्लाइड फिल्म)

(बाएँ) उत्तराखंड में विभिन्न जगहों पर तरह तरह के बर्तन इस्तेमाल होते हैं। नौले से पानी भर कर लाना महिलाओं के लिए सदा से एक मुख्य कार्य रहा है। टिहरी के समीप के गांव के इस चित्र में पीतल की गगरी में पानी ले जाती महिलाएँ। (स्लाइड फिल्म)

(दाएँ) उत्तराखंड के गाँवों में लगभग हर घर के प्रांगण में ओखली होती है जिसमें महिलाओं द्वारा मोटा अनाज कूटा जाता है। मण्डल (गोपेश्वर) के निकट एक गाँव में खींचे गए इस चित्र में दो महिलायें अनाज कूट रहीं हैं। (स्लाइड फिल्म)

सामाजिक संस्थाओं द्वारा समय समय पर महिला सशस्त्रीकरण के लिए किए जा रहे प्रयोगों के अंतर्गत आय उपार्जन की विभिन्न विधियाँ सुझाई जाती रही हैं. इनमें से एक है नाल बड़ी बनाकर उसे बाजार में बेचना। इस चित्र में दो महिलाऐं ऐसी ही एक योजना के अंतर्गत नाल बड़ी बना रही हैं। (स्लाइड फिल्म)

खेतों को अगली फसल के लिए तैयार करती महिलायें। (स्लाइड फिल्म)

पहाड़ों में जिन जिन जगहों के आसपास पानी के गधेरे या धारा हैं वहाँ पर कुछ समृद्ध लोगों ने जल इकठ्ठा करने के लिए टैंक बनाये हैं। ऐसे ही एक स्थान पर अपने पानी के टैंक से पत्ते निकलती एक महिला। (स्लाइड फिल्म)

उत्तराखंड में हमेशा से जैविक कृषि का ही प्रचलन रहा है जिसमें गोबर से बनी खाद का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक रसानयिक तरीकों के आगमन के बावजूद आज भी जैविक कृषि का प्रचलन अधिक है। पारम्परिक तरीकों के अलावा जैविक कृषि के अन्य तरीके भी उपयोग में लिए जाने लगे हैं। प्रस्तुत चित्र में एक महिला अपने खेत में बायोडाइनैमिक विधि से तैयार की गई खाद डाल रही है। (स्लाइड फिल्म)

पहाड़ों में कृषि योग्य भूमि कम है तथा सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भरता रहती है। इनके चलते उपज भी कम होती है और अक्सर परिवार अपने लिए ही पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पाते हैं। इस चित्र में एक वृद्ध महिला सूपे से अनाज साफ़ कर रही हैं। (स्लाइड फिल्म)

जिन घरों में गाय और भैंस से पर्याप्त मात्रा में गोबर प्राप्त होता है वहाँ गोबर गैस बनाने की अच्छी संभावना है। इसके लिए कुछ लोगों ने गोबर गैस संयंत्र लगाए हैं। इस चित्र में ऐसे ही एक परिवार से एक महिला गोबर गैस संयंत्र को प्रयोग में ला रही है। (स्लाइड फिल्म)

गढ़वाल में दो महिलायें अपनी टोकरियों को लेकर जंगल की तरफ जाती हुई। (स्लाइड फिल्म)

अपने खेतों में फसल बोने से लेकर उसे सींचना, खाद डालना तथा फसल काटने के बाद उसे कूटने या पीसने का सभी कार्य अमूमन महिलायें ही करती आयी हैं। प्रस्तुत चित्र बेरीनाग के पास के एक गाँव का है जिसमे दो महिलायें चक्की पीस रही हैं। (स्लाइड फिल्म)

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संजय नैनवाल
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